पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३६७

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मांस ३२१ . .वाधिक 'अरुचि, धमि, प्रमेह, मुसका रोग, श्लोपद, गलगण्ड और के मांस वायुनाशक, गुय, उष्णवोय, मधुररस, मुलायम वातरोगनाशक है।.. और यलकारक हैं। ये मांस आँख भीर गुह्यरोगीके लिये . मासवर्गो द्विधा शेयो जागलोऽनूपशकः । विशेष हितकर है। .....मांसवर्गोऽत्र जद्धाला विलस्थाच गुहाशयाः ।। पर्यामृग-धन्दर, विडाल, पेड़ों पर रहनेवाली वन्द. तथा पर्यामगा शेया विष्किराः प्रतुदा अपि । रियोंको सुश्रुत आदि महर्षियोंने पर्ण मृग कहा है। इनके प्रसहा अथ च प्राम्या अप्टौ जाङ्गसजातयः॥ मांसका गुण वीर्यवर्द्धक, चक्ष और शोपरोगियोंके लिये .. जशा मधुरा स्वास्तुवरा अयवस्तथा। विशेष हितकर है। यह मलमूत्रको शीघ्र निकालता और बल्यास्ते वृहणा वृष्या दीपना दोषारिणः ।। खांसी तथा बवासीर और दमेके रोगको नाश करता है। मूकता मिन्मिनत्वच गद्गदत्वादिते तथा ॥ विष्किर-घटेर, लाया, तीतर, मुर्गा आदिको विकिर कहते .....वाधिर्यमरुचिच्छदि प्रमेहं मुखजान गदान । हैं। ये चोंचसे खाते हैं इससे इनका विकिर नाम हुमा ., . लीपद गलगपडच नाशयत्यनिझामयान ।" है। इनका मांस मधुर, कपाय, शीतवीर्य, कटुविपाक, (भावप्र.) बलदायक, शुक्रवर्द्धक और विदोषनागक है । यह सुपथ्य . . इन माठ तरहके जाल जातिमें हरिण, एण, फुरङ्ग, और लघु होता है। ऋप्य, पत, न्यूकु, सम्बर, राजीव और मुण्डी आदि. ___प्रतुद-हारीत (हरे ), धवल (सफेद) और पाण्डुवर्ण को जङ्घाल कहते हैं। हरिण-तायेके रङ्गका मृग, एण-काले रंगका मृग, फुरङ्ग- अर्थात् जिसका आकार (पोला) तीतर, वड़ा सुग्गा, कबूतर, खान, फोयल आदि- पड़ा और, कुछ सायेके रङ्गका और जिसकी आकृति को प्रतुद कहते हैं। यह अपने आहारको अपनी चोचोंसे देखने में काले हरिणकी तरह है। ऋष्य-नीला हरिण । पटक पटक कर खाते हैं, इसलिये इनका नाम प्रतुद है। यह सरोहा नामसे भी प्रसिद्ध है। जो मृग हरिणको इन सोंका मांस मधुर, कपाय, पित्तन, कफनाशक, अपेक्षा कुछ मोटा, शरम्यन्द्रकी तरह घुतियुक्त है, उसको शीतवीय, लघु, मलरोधक और सामान्य वायुको बढ़ाने- हो पृपत् कहते हैं। जिसके सीग बड़े होते हैं, उस- पाला है। का नाम न्य'कु है। बड़े आकारफा मृग सम्बर कह- ___ प्रसह-कौआ, गोध, उल्लू, चील आदि प्रसद नामसे लाता है। यह गवय नामसे भी विख्यात है। जो चित- विख्यात हैं। ये भी अपने आहारको पटक पटक कर कवरे होते हैं, उसका नाम राजीव है और जिस मृगके खाते हैं, इससे इनका प्रसद नाम पह। इनका मांस सींग नहीं है यह मुण्डी कहलाता है। इन सब मृगा. उप्यावीर्य है। इन सब जन्तुओंके मांस खानेसे शीप, भस्मक के मांसका गुण प्रायः ही कफ और पित्तनाशक तथा | और उन्मादरोग उत्पन्न होता है तथा वीर्य क्षीण वायुपर्द्धक, लघु और बल देनवाला है। होता है। क्लेिशय-गोधा, खरगोश, सांप, चूहे, साहोको ___ ग्राम्य-वकरा, भेडा, गैल, घोड़ा आदिको प्राम्य कहते पिलेशय कहते हैं। इन सवोंका मांस वायुनाशक, मधुर-1 हैं। सभी ग्राम्य मांस ही वायुनाशक, अग्निवद्धक, विपाक, शरीरको उपचय करनेवाला, मलमलको रोकने- कफ, पित्तवर्द्धक, मधुररस, मधुरधिपाक, शरीरका उप- याला और उप्पवीर्य माना जाता है। चयकारक और बलवर्धक है।' । गुहाशय-सिंह, शेर, एक, भाल, तरक्ष, दीपी, यन, पहले जो हमने अनूप मांसका उल्लेख किया है, यह गोदड़, बिल्लो-इन सर्वोको गुहाशय कहते हैं। तरक्ष पांच भागोंमें विभक है । यथा-कुलेचर, प्लव, कोशस्य, नेकड़े वाध, द्रोपीको चीता वाघ और जिसकी पूंछ मोटो) पादी,और मत्स्य मांस । इनके मांस साधारणतः मधुर- और. यांखें - लाल ... रंगकी, होती है उसको नेवला | रम, चिकना, गुरु, अग्निमान्यजनक, कफकारक, अत्यन्त कहते हैं । संस्कृतमें नकुल या वभूकहते हैं। इन मो- मांसपोएक और यह प्रायः हो हितकर है। .. Vol. xv.1, 81