पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३७३

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मांसकच्छप-मांसपाक ३२. व्याकरणके अनुसार पाक शब्द और पाचन शब्द। पर्याय-मांसी, मांसरोही, रसायनी, सुलोमा, लोम- पोछे रहने पर मांस शब्दका अन्त्यलोप होता है । कारिणी । ( राजनि०) पथा- मांसच्छेद (स.पु० स्रो०) मांस-विक्रयी, जो मांस काट "मास्यचन्त्या उखाया।" (महाभाष्य) कर विक्री करता हो। मन-सः दीर्घश्व । (.पु०)५ फाल।६ कोट । ७ मांसच्छेदिन (स० पु०) मांस विक्रयकारी जातिविशेष, वर्णसङ्कर जातिविशप । मांस बेचनेवाली एक जाति। "चतुरो भागधी सूते क्र रान्मायोपजीविनः। मांसज ( स० क्ली० ) मांसाजायते जन-ड। १ देहिस्थत मांस खादुकर झौ सौगन्धमिति विश्रुतम् ॥" मांसजन्यभेद, मांससे उत्पन्न शरीरमें-को चीं। (नि.) (महा० १३१४८।२२) । मांसजातमात, यह जो मांससे उत्पन्न हो। मांसफच्छप (सं० पु०) तालुगत मुखरोगभेद। सुश्रुतके मांसजाति (स० स्त्री०) मृग, विष्किर, प्रतुद, प्रसह, विले. अनुसार एक प्रकारका रोग जो तालूमें होता है। शय, महामृग, जलचर और मत्स्य मादि ये आठ प्रकार मांसकन्दी (स' स्त्री० ) अधुदविशेष, आयु ।। की मांसजाति है। (पर्यायमुक्तावली) मासकी (स स्त्री०) १ वरट्यादि कीट, गंधिया कीड़ा। मांसजाल (सं० क्लो० ) जालवन्मांस, जालके जैसा मांस, २ पशुण्डा। मांसझिल्ली या जाला । मांसजाल, शिराजाल, स्नायुजाल मांसकाम ( स० वि०) मांसप्रिय, जिसको मांस खानेमें और अस्थिजाल ये प्रत्येक चार चार हैं। ये आपसमें . अच्छा लगता हो। संश्लिष्ट और आपसके छेद में मिल कर मणिवन्धसे गुल्फा मांसफारिन् (सक्लो०) मांस' करोतीति कणिनि । तक रहते हैं। - रक्त, लहू। मांसतान ( संपु०) कण्ठगत मुखोरोगभेद, एक प्रकार: मांसफोलक (सपु०) स्वनामख्यात गुह्यरोगभेद, वचा- | का गलेका भोपण रोग । इसमें गलेमें सूजन हो कर चारों सीरका मसा। इस रोगको अभेिद भी कह सकते हैं। ओर फैल जाती है और इसमें बहुत अधिक पीड़ा होती (वागभट्ट ३३ अध्याय) । है । यह रोग विदोपसे उत्पन्न होता है। इससे कभी मांसफोशिन् (सं० पु०) पादरोगमेदयुक्त अश्व, वह | कभी गलेकी नालो घुट कर बंद हो जाती है और रोगी घोड़ा जिसके पैरोंमें मांसके गुटले निकलते हो। मर जाता है । ( मुश्रुत नि० १६ अ०) मांसकोथ (स० पु० ) मांसगलन, मांसका गलना। मांसतेजस ( स० क्ली०) मांसात् तेजोऽस्य बहुवो। मांसखण्ड ( सं क्ली०) मांसका टुकड़ा। मेद, बीं। मांसखोर (फा०शि०) मांस खानेवाला; मांसाहारी। मांसदलन (सं० पु०) मांसं घोहात्मक दलयति कृशीकरो- मांसखुर ( स० पु० ) पादरोगविशेषयुक्त अश्य, यह | तौति दल-णिच् न्यु । लोहनवृक्ष, लाल रोहितक पेड़। घोड़ा जिसके खुरमें मांसके गुठले निकलते हों। मांसदायिन् (संपु०) मांस' द्रावयति णिच-णिनि । मांसगज्वर ( पु) ज्यरविशेष। इसके होनेसे ज घे| अम्लयतस, अमलवेत । के आधे भाग घेदना, पिपासा, उष्मा, अन्तर्दाह, विक्षेप मांसघरा ( स० स्त्रो०) १३स नामकी पहली कला ।२ और ग्लानि आदि होती है। | स्थलापर नामक सप्तम त्यक सुश्रुतके अनुसार शरीरके मांसप्रन्थि (सं० पु०) मांसजात प्रन्थिरोग, मांसको चमड़े की सातवी तह जो स्थूलापर भी कहलाती है। गांठ जो शरोरके मिन भिन्न अंगोंमें निकल आती है। मांसपचन (सं० को०) मांसस्य पचनम् । मांसपाक ! मांसच्छदा ( स० स्त्री०) मांस छादयति छद् णिच: मांसपाक (संपु०) १ मांसपाककरण, मांस पकाना अच हस्व, अथवा मांस इव छदः पर्णमस्याः तदुपरि यारीधना । २शकररोगभेद, एक प्रकारका लिंगका रोग। लोमोत्पत्तेरस्यास्तधात्वं । मांसरोहिणी नामको लता। इसमें लिंगका मांस फट जाता है और उसमें पीडा Vol. XVII, S1