पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४२

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गसजिद-मसन सन् १४६६ ई० में सुलतान काइतबका मकबरा। (७) १७वी सदीमें पलोरेन्स पत्थरकी यड़ी आमदनी अलजोरिया नगरको १०वीं सदीकी वनी मसजिद को हुई। इसीके साथ साथ वहाँफे भास्कर (Mosnic की प्रतिष्ठाके लिये बनी थीं। worker ) यहां आने लगे। मुगल बादशाह उस समय स्पेन राज्यके फाडौँवा समीपको जहराको मसजिद भारतमें राज्य करते थे। उन्होंने ही इस सुन्दर और सन् ६४१ ई०में धनी थी। यह उस समयको कारकार्य । चिकने पत्थरसे यहुत धन खर्च कर आगरेका जगत्- खचित है। सिवा इसके उस राज्यको टोलाडोर कृष्ट विख्यात ताजमहल और मोती मसजिद बनाई थी। इन जी ला-लज आदि कई मसजिद इस समयके गिरजोंके | सयोंकी यह कीर्ति अयश्य ही इस समय , अतुलनीय रूपो परिणत हो गई है। मालूम होती है। ताजमहल देखो। फारस राज्यके हारुन-उल-रसीदके राज्यमें जो काश्मीरको राजधानी श्रीनगरमें शाह हमदनकी. सय खूबसूरत तथा नकाशीके कामसे पूर्ण मसजिद बनाई एक लकड़ीकी मसजिद है। इसके खम्भे देवदार- पनी थो, उनमें एक भी इस समय मौजद नहीं। अजें वृक्षके और नकाशी काम किये हुए हैं। राम, तानिज और इस्पाहन नगरको बनो मसजिदें मसजिदकुण्ड-बङ्गालके यशोहर (जैसोर).जिले में एक प्राचीन शिल्पकी अशता रक्षा कर रही हैं । सन् १५८५. | स्थानका नाम । यहाँ एक पुरानी मसजिद थी। यह १६२६ ई० में शाह भाव्यास प्रथमकी यनाई 'मसजिदशाह' ! टूटी फूटो रहने पर भी इसके ६ गुम्बज, चार कोनों पर नामको मसजिद फारसके शिल्पोन्नतिको पराकाष्ठाको । चार शिखर और स्तम्म छत आज भी मौजूद हैं। बहु. परिचय दे रही है। सुलतान हुसेनको सन् १७३० तेरे साठ गुभ्वजके पनानेवाले खानजहानको 'ही इसके, ६०को मसजिदमें पुराने कलाकौशलके बहुतेरे नमूने पापे | वनानेवाला समझते हैं। यह स्थान कपोतास तीरवती . जाते हैं। चांदखालीसे ३ कोस दक्षिण है। यह अक्षा० २२ २८ ___ भारतवर्ष में मुसलमानोंने हजारों वर्षके राजत्वमें | ४४” उ० तथा देशा० ८६ १६३०"पूर्वके मध्य गय- जो मसजिदे यनाई हैं, वे सभी शिल्प सौन्दर्यसे परि- स्थित है। सुन्दरवनको साफ कर खेती करने के समय पूर्ण तथा आलीशान हैं। विधी मुसलमानोंने भारत• यह मसजिद पाई गई थी। इस मसजिदमें यहांके लोग में आ कर जिन सब प्राचीनतम हिन्दू, जैन, बौद्ध शिरनी चढ़ाया करते हैं। मन्दिरोंको तोड़ा था, उन्हीं की ईट और उन्हीके सामानों. | मसट-कलकत्तेके दक्षिणमें अवस्थित एक प्राम। यह से मसजिदें यनाई गई थीं। हिन्दुओं के देवमन्दिरोंको | वालोगंज भोर. गड़ियानगरके वीचमें बसा हुआ है। तोड़ना, अपवित करना मुसलमानोका मुख्य उद्देश्य था। यहाँ प्रति वर्ष पूसफे महीने में मुसलमान-साधु माणिक कहते हैं, कि प्राचीन दिल्लीको यड़ी मसजिद जिस पीरके उद्देशसे तीन दिन तक एक मेला लगता है। समय यनी थी, उस समय गुलाम-यंशने २७ हिन्दू आसपासके हिन्दू और मुसलमान मेले समय माणिक मन्दिरीको तोड़ कर उनके शिल्पसमन्वित उपकरणोंसे | पोरकी पूजा करते हैं। हो वनाई थी। आज भी इस मसजिद में हिन्दू और मसट्टी (अ० स्त्री० ) कन्द। . . मुसलमानके तस्योरोंका भपूर्व समावेश दिखाई देता मसड़ो ( हिं० स्त्री० ) एक प्रकारका पक्षी । है। अजमेरको १३वीं सदीको मसजिद भी इसी तरह मसती (हिं० पु०) हाथी । हिंदूमन्दिरके सामानोंसे बनाई गई थी। सिवा इसके मसनंद (हिं० खो०) मसनद देखो। महमदावाद, माण्ड, मालदद, यजापुर, फतेहपुर आदि मसन (सं० को०) मस्यते इति मस-ल्य ट। सोमराजी स्थानोंको यहुतेरो मसजिद' हिन्दुमन्दिरोंके सामानोंसे वृक्ष। बनाई गई है। इनकी आलोचना करने पर एक एक मस. | मसन ( हि पु०) एक प्रकारका रकुआ। इससे उनके जिदफे सम्यन्धमे एक एक पोधा लिखा जा सकता है। कई तागे एक साथ मिला कर बटे जाते है। ...