पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४६३

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. पानवतत्त्व ४०७ मध्यस्थ तीय हुताशनकें तीक्ष्ण उत्तापसे भस्म न होता। जो कुछ हो, धैज्ञानिक घुधमण्डली गभी एक वाफ्य- हो ऐसा कोई पंदार्थ हो नहीं है। से स्वीकार करती है, कि प्राथमिक सभ्यताके छोटे . मानयतत्त्व सभ्यताको विभिन्न स्तरपरीक्षा करके | फुरसे आज विज्ञानके विचित्र वेभयसम्पन्न बहुत विकाशपद्धतिको कारणावली प्रदर्शन करता है। इति । विस्तृत सभ्यतापादपकी उत्पत्ति हुई है । पृथ्वी पर हास अतीतकी दृष्टान्तावलीकी मुक्तकण्ठसे घोषणा कर जातिविशेषकी अवनतिसे हो समान मानवजातिको उमति कहता है, कि शानके विस्तार द्वारा हो सभ्यताका विकाश, होतो है, इसमें संदेह नहीं। अभिनव उपायका- उद्भावन, अज्ञाततरवका आविष्कार, सभ्यसमाजमें मादिम रीतिनीतिका अनुजीवित्व । शिल्पवाणिज्यकी उन्नति और मानव जातिका सुख टाइलर साहवने 'प्राथमिकशिक्षा' नामक पुस्तकमें ऐश्वर्य वढ़ता है। आर्यविशप हटली ( Whately) ने दिखलाया है, कि मनुष्य अभी शिक्षा और सभ्यताके . 'सभ्यताकी उत्पत्ति' (Origin of civilisation) नामक/ उच्च सोपान पर अधिरूढ़ होने पर भी घे प्राथमिक वर्वर प्रेन्यमें तथा टाइलर (Tylor)-ने 'मनुष्य-इतिहास' य- समाजके आचार व्यवहारके कुछ संस्कारोंको छोड़ नहीं में दिखलाया है, कि जिस प्रकार एक जातिका मनुष्य सके हैं। अगरेज पादरीका सामरिक विहयुक्त वेश विवर्त्तके उच्च आवर्तसे उन्नतिके सोपान' पर चढ़ता है, (Coat of arm) का धारण प्राथमिक युद्धमधानयुगका दूसरी जातिका मनुष्य उसी प्रकार अधःपतनके पिच्छिल परिचय देता है। वर्तमान हिन्दूजाति अंगरेजी सभ्यता- पंचसे फिसल जाता है। जातिको उन्नति और अब से सुसभ्य होने पर सो यशीय पवित्र अग्नि नति विभिन्न जाति के साथ संघर्षका फल है। उत्पादन करनेके लिये दियासलाईका व्यवहार न कर प्रायः सभी देशोंके पौराणिक ग्रन्थ और धर्मशास्त्र । भरणि संयोगसे पवित्राग्नि उत्पादन करते हैं। कहते हैं, कि यह जो विराट् मनुष्यसमाज दिग्नाई देता है । अंगरेज ' लोग अति सभ्य और विज्ञान आलोक- 'उसकी उत्पत्ति पकमान मानवदम्पतीसे हुई है। वह से उद्भासित होने पर भी चाइघिलमें जो कुसंस्कार है आदिम मनुष्यदम्पती वन घनमें शिकार करते थे, अपने उसं सुधार नहीं सके हैं। इसीसे आज भी उन लोगों 'हाथसे हल चलाते थे । इससे मालूम होता है, कि मनुष्य के मा परलोकगत आत्मीयवर्गकी प्रेतात्माके परि- अमिष्यक्तिवादके द्रुतपदक्रमसे उन्नतिके शीर्षस्थान पर तर्पणके लिये असभ्य जातियों के जैसा पिण्डतपणादि पहुंचे हैं। केवल हेसियड ( Hasind ) अन्यमें लिखा (All Soul's Supper ) की व्यवस्था है। जाविद्या है कि सबसे पहले उत्पन्न मनुषपदम्पती सभ्यताके समी। आदिमें भी असभ्य समाजका संस्कार विद्यमान है। जो गुणों से विभूपित थे। उनके समयमें सत्य अथवा सुवर्ण किसी किसी पशुपक्षोकी पोलीसे भावो अमालको पूर्व युग विद्यमान था। हिन्दुशास्त्रका मानवतत्त्व ऐसे हो। सूचना समझते हैं, उनके भीतर भी आदिम अवस्थाका सिद्धान्तसे संस्थापित है। चिह्न विद्यमान देखा जाता है। ___ वैज्ञानिकोंमें कोई कोई कहते हैं, कि पशुमाय एस्कु- टाइलर साहवका सिद्धान्त सर्ववादिसम्मत है ऐसा इमो जाति अभिव्यक्तिके अनन्त आवतंसे भो सुसभ्य नहीं कह सकते । विज्ञान मृत्युके दूसरे किनारे तक जाति नहीं हो सकती। किन्तु मिश्र, ग्रीस भासिरिया, पहुँच नहीं सकता । रसायन विश्लेषणकी अनन्त वायिलन, चीन आदि देशोंकी भूस्तरावलोको मालोचना परीक्षासे चेतनाशक्तिके उपादान संप्रदमें अक्षम है । सत- करके प्रततत्वविद् तथा मानवतत्वविद पण्डितोंने दिख.' एव अशे यतत्वके स्वपक्ष या विपक्षमें टाइलरका माध्य लाया है, कि सभी देशोंमें एक समय शैलयुग विराज-, प्रहणीय नहीं है। हिन्दू ज्ञातिने योगयलसे .सर्वाता मान था। उस समयके मनुष्य पत्थरके बने हथियारसे लाम की थी, आज भी योगवलसे प्रभूत अनुशीलन होता शिकार करते थे। इन सब युक्तियों से मानयतस्य अमि-- हे यह केवल विज्ञानको गंडी रेखामे सीमावद्ध है, ऐसा व्यक्तिवादको गुढ़ मित्ति पर संस्थापित हुआ है।.. किसने कहा ?