पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४६९

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मानसपुत्र-पानसरोवर ४१५ मानसपुत्र ( स० पु.) पुराणानुसार वह पुत्र या संतान अमायामनहङ्कारमरागममदन्तथा। जिसको उत्पत्ति इच्छा मात्रसे हुई हो । अमोहकमदम्मञ्च अनिन्दाक्षोभको तथा | मानसपूजा (सं० स्रो० मानसता पूजा शाकपार्थिवयत् अमात्सर्यमलोभञ्च दशपुष्प विदुषुधाः। समासः। मनोरचित द्रव्यकरणक सपर्या । देवपूजा दो अहिंसा परमं पुष्पं पुष्पमिन्द्रियनिग्रहः । तरहसे करनी होती है, पाय और मानस । पाद्य, अर्ध्य, दयापुष्पं क्षमापुष्पं ज्ञानपुष्पञ्च पञ्चमम् ॥" आचमनीयं, गंध, पुष्प आदि वाहोपकरण द्वारा जो पूजा' मानसपूजामें पहले कुलकुण्डलिनी देवीको मूला- को जाती है उसे वाद्य तथा अन्तरोपकरण द्वारा मन ही धारसे उठा कर हृदयके नीचे सूर्यमण्डलमें ले जाना मन करनेवाली पूजाको मानसपूजा फहने हैं। तन्त्रसारमें होगा। पोछे सहस्त्रदलकमलके अन्तर्गत चन्द्रसे झरती मानसपूजाका विषय इस प्रकार लिखा है, जिस देवताको, हुई अमृतधारा द्वारा मूलमन्त्रको स्मरण कर अभिषेक पूजा करनी हो, पूजक पहले हृदयपद्मके मध्य उसी देवता काना होगा। अनन्तर विविध विपयरूप कुसुमी द्वारा की मूत्तिका स्मरण करे। बाद उसके कुण्डलीपात्रमें रसे | अर्चना करके उसी समय तन्मय हो जाना होगा। यहां पर हुए सहस्त्रधारामृत द्वारा पाध, मनको अर्य, सहस्त्रदलपम- तन्मयता युद्धि ही न्यास तथा तन्मयताका अर्थ एकत्य- रुपनारस्थ जलसे आचमनीय, प्रकृति, महत् , अहंकार ज्ञान है । यह पूजा सोऽहंभावसे ही करनी होगी। ग्यारह इन्द्रिय, पञ्चतन्मात और पञ्च महाभत ये पचीस' सोऽहंभावके अर्थमें कुण्डलिनी शक्तिमें सभी मन्ताक्षर तत्त्य गन्ध, अहिंसा, विज्ञान, क्षमा, दया, अलोभ, मोह, प्रथित है। यह कुण्डलिनी शक्ति परमानन्दमयी है तथा अमोत्सर्य, अमाया, अनहकार, अराग, अपि तथा परमाकाशमें अग्रस्थान करती हैं। ये साधककी आत्मासे सभी इन्द्रियां ये बारह पुष्प, तेजोरूप, दीप, वायरूप धूप, अभिन्न हैं, ऐसा हो स्मरण करना होगा। पहले ही कह अम्बररूप चामर, सूर्यरूप दर्पण, चन्द्ररूप छत्र, पद्मरूपा आये हैं, कि विषयपुप्प द्वारा पूजा करनी होगी। विषय. मेखला, आनन्दरूप उत्तम हार आदिको मन ही मन कल्पना. पुष्प दश हैं, यथा-अमाया, अर्थात् मायाका अभाव, सन- कर उत्सर्ग करे। पूजा के बाद घंटादि बजाया जाता है, ' हंकार, अराग, अमद अमोह, अदम्भ, अनिन्दा, अक्षोभ, इस मानस पूजाम भी घंटे बजाने होंगे। यह सुधारसमय अमात्सर्य भीर अलोभ । इसको छोड़ कर अहिंसा, अम्बुधि, मांसपर्वत और ब्रह्माण्डपूरित पायस उपचार इन्द्रियनिग्रह, दया, क्षमा और शान ये पांच परमपुष्प हैं। स्वरूप देना होगा। इस प्रकार कल्पना कर मन ही मन इन्हीं पन्द्रह पुष्पोंसे मानसपूजा करनी होगी। (तन्त्रसार) पूजा करनी होती है इसीसे इसका नाम मानसपूजा हुआ' पूजाके समय पहले पुष्प द्वारा जिस देवताको पूजा हैं। विना मानसपूजाके वाहपूजा नहीं होती। करनी होती है उसी देवताका ध्यान कर इसी प्रकार (तन्त्रसार त्रिपुरामकरण) मानसपूजा करना उचित है । मानसपूजा शेप होने पर - मानसपूजा-"मुन्नाधारात पुलकुपडलिनी उत्थाप्य फिर ध्यान करके पाहापूजा करनी होती है। सभी हृदयादमपडलं नीत्वा सहस्त्रदमकमलान्तर्गतचन्द्रामृतधारया पूजामोंमे मानसपूजा आवश्यक है। गुरुपूजा आदिमें भी मूलमन्त्र स्मरन् सिन्चत् । मानसपूजा करनी होती है। पूजा देख्यो ।

"मययन विषय: पुष्पस्तत्क्षणात्तन्मयो भवेत् । मानसर ( स० पु०) मानसरोवर देखो।

न्यासस्तन्मयतासिद्धिः सोऽह-माधेन पूजयेत् ॥ मानसरुज स० स्त्री०) मानसी रुक । मनःपीड़ा, मनमें तन्मयेति तदेकत्यशानं सोऽहमिति- चोट। भन्माक्षराणि चिच्छनौ प्रातानि परिभावयेत् । मानसरोवर-हिमालयके उत्तरगावमें अवस्थित एक तामेव परमव्याम्नि परमानन्दवृहिते । पुण्यतोय हद। यह लक्षा० ३०८ उ० तथा देशा०६१ दर्शयित्वात्मसदा पूजाहीमादिभिर्थिना ।। ५३ पू०के बीच पड़ता है। यह पुराणयर्णित कैलास- विषयपुष्पाणि यथा- । पर्वतके दक्षिणपार्श्वस्थ अक्षन नामक पर्वतके निकट