पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४७

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पसूद (भमोर मुलतान)-महद ३५ (सुलतान) इसके बाद ये ये रोकाक नगीनावादसे गजनो । दिया और कहा, 'अगर तुम हफैनीको मृत अथवा जोयित 'पहुंचे। जिस किसी अवस्था हो, मेरे पास हाजिर करो, तभी ___ गजनीके सिंहासन पर यठ कर सुलतान मसूदने, मैं तुम्हारा मुंहदेगा, इस योचमें नहीं। मनन्तर मसूद अपने भाई महम्मदकी आखें निकलया साली। किन्तु : दो सौ घुड़सवार सेगा ले कर अपतोंकी तलाममें ये विशेष दया और न्यायपरताके साथ प्रजापालन करते निकले। उन लोगों के दुर्गके समीप ज्ञानेसे उन्हें मालूम थे। उनके शासनकालमें राज्य भरमें जगह जगह मस हुआ, कि डीन लोग उनके मानेकी खबर सुन कर ममी जिद, विद्यालय और पान्यनिवास खोले गये थे। घे हर | तुरत भाग गये है। अप मसूदने आने ५० अनुचरीको साल भारतवासी विधमों हिन्दुओं के विरुद्ध युदयाता| हुकुम दिया कि 'तुम लोग अपने अपने हथियारको जीनमें फरते थे। इस प्रकार एक बार भारत आमगणके याद छिपा रखो भीर मुसाफिरक येशमें चल चलो, रास्ते जय घे स्वराज्यको लौट रहे थे. तय गहमें नस्तीगिन, | यदि उन एकतों से मुलाकात हो जाय, तो किसी प्रकार भली खुशावन्द और युसुम विन यक्तगिनफे पुत्रों ने कौशलसे उन्हें रोक रखना।' इतना कद पर मसूदने उन्हें पकड़ कर महम्मदके पास हाजिर किया । महम्मद उन पचासोंको विदा किया और आप वाको डेढ़ सौ ने मसूद्को कैद कर मार डाला। मसूदने सिर्फ १२ घर्ष। सेनाके साथ उनके पीछे पोछे जाने लगे। इफेनोंको जब राज्य किया था। उन पचासों पर निगाह पड़ी, तब पे एकाएक उन पर टूट मसूदके युद्धि-कौशल और पराक्रमके विषयमें एक पड़े। दोनों पक्षमें युद्ध चलने लगा। इसी समय मसूद • अलोकिक उपाख्यान सुननेमें आता है। कहते हैं, कि मी वहां जा धमके। सभी दफत पकडे गये, एक भी एक दिन सुलतान महमूदने किरमाणके राजाके पास | भागने नहीं पाया । उनमेसे सिर्फ ४०को मसूदने कुल मूल्यवान यस्तु भेटमें भेजो। किरमाणको परिश। वांध छान कर सुलतानके पास भेजा था, शेष समो मार मामक मरुभूमिमें एक इकैतो'का एक बदमाश दल डाले गये थे। रहता था। उस दलमें ८० आदमी थे। निराश्रय पथिकों- मसूद्र २य अलाउदिन, मुलतान )-गजनीके सम्राट् । के प्रति अत्याचार करना और उनके द्वयादि लूटना हो। इनके पिताका नाम मादिम था। १०६१ १० गजनी. उनका एकमात्र व्यवसाय था । सुलतानक दूतको नगरमें मसूदका जन्म हुआ। १७ वर्ष तक न्यायपरता. मूल्यवान उपहार लिये जाते देख ये अपने लोभको रोक के साथ प्रजापालन फरके १९१५ में ये परलोकको न सके । दृतफे साथ जितने सिपाही जाते थे प्रायः सिधारे । सुलतान सञ्जरको यहिन के साथ इनका यियाह बहुतों को मार कर उन्होंने उनका सर्वस्व लूट लिया हुआ था। और यहांसे ये भागे । जो दो एक बच गये थे उन्होंने सुलतान मसूद दयालु और उदार प्रतिके मनुष्य सुलतानके पास जा कर इसको खबर दी। सुलतान थे। धार्मिकता भीर. न्यायपरताने उनको राजशक्तिको यह प्यावर पा कर पडे. विस्मित हुए। इसी समय मसद मलहत कर दिया था। हीररसे लौटे थे। किन्तु जब ये पिताके पास गये तो मसूद (मालिक)-गुजरातके वादनाद बहादुरागके मिर। पिताने जरा भी उसका सम्भापण नहीं किया । इस जव बहादुर मां महमूद नगर पहुंचे, तब मालिक मसूद पर मसूब उनके चरणों में गिर पडे. भीर अपराधका | और अन्याय सामन्तीने उनका माध दिया था। पेममा कारण पूछने लगे। पिताने कदा, 'मसूद ! तुम्हारे जैसे इमाद् उल मुक्कके भयसे स्वदेशका परित्याग कर छिप पुत्र रहते राज्यमें ' केतो की नादिरशाही चल रही है, फर ापना समय बिताते थे। अभी उन्होंने जय सुना भाश्चर्य है। मसूद बोले, 'पिताजी! मैं होरटमें रहना कि बहादुर सां इमाद-उल मुस्कको परास्त करने माये है, था, इसी समय परिश मरुभूमिमें एकनी हुई, इसमें मेरा तब मसदने बहादुरमांका पक्ष लिया था। मपराध या सुलतानने उसकी बात पर ध्यान नहीं ममूद ३य (मुलतान)-नोके एक मुलतान । इनका Vol. XVII. 11 १०१