पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५०

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परिका चाहिये । इस घरमें जूठो फुटो चीज कभी आने यह सब शीतला रोग होने पर देव पर ही भरो. न देनी चाहिये। फोहोंमें दाह होने पर सूपये गोवरका कर रदना ठोक है। विशुद्धांचारो घालणसे शीतलास्ट चूर्ण देना चाहिये। चन्दन, अड़ स, मोथा, गुरुचि, ' पाठ कराना चाहिये। रोगीको भक्तिफे सांप सुन द्राक्षा इनका शीतल जल पीनेसे शीतला-ज्वर रुक : चाहिये। इससे ही मसूरिका (शीतला ) रोग नोर जाता है। जप, होम, दान, खस्त्ययन और गो-ब्राहाण, ' होता है। शीतलास्तच इस तरह है। यथा,-' शिव तथा दुर्गाको पूजासे शीतला रोग निवारित होता स्कन्ध उवाच। - ... है। रोगोफे निकट शुद्धाचारी ग्रामणके शीतलाष्टक "भगवन् देवदेवेश शीतक्षायाः स्तवं शुभम्। . . पाउसे बड़ा उपकार होता है। वस्तुमर्हस्यशेपेय विस्फोटकभयापहम् ॥" . शीतला रोगका प्रभेद -कोद्वा नामक शीतला वायु ईश्वर उवाच। - - - और फफसे कोद्रव (कोदो)को तरहफी होती है। कुछ लोग "नमामि शीतला देवीं रासभस्था दिगम्बरीम् ।.. कहते हैं, कि यह पफ जाता है, किन्तु वास्तवमै ऐसा नहीं मार्जनीकालमोपेवा शुपानंकृत मस्तफाम् ॥ होता । जलभूकद्रया नामक शीतला होनेसे शरीर . वन्देऽहं शीतला देवी सर्वरोगभयापहाम् । ... छेदनेको तरहका दर्द होता है। यह रोग सात दिन या यामासाद्य निवत्त त विस्फोटकभयं महत् ॥ : . धारह दिनके याद चिना दया किये प्रशमित हो जाता शीतले शीतले चेति यो व याहाहपीडितः 1... है। विशेष औषधोपचार करनेकी आवश्यकता होने पर विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रयारयति ॥ .. खदिराएको पयाथसे बहुत ही उपकार होता है। यस्त्वामुदफमध्येनु धृत्वा संपूजयेसरः । । _____ उपमा द्वारा सफेद सरसोंके दानेको भांति फिर भी। विस्फोटकभयं घोरं गृह तस्य न जायते । । । 'खुजलाहटफे साथ जो फोड़े होते हैं, उसको पनीरहा शीतले ज्वरदग्धस्य पूतिगन्धगवस्य च। कहते हैं। यह सात दिनके बाद आप ही आप सम्प प्रनष्टचक्षुपः पुंस्त्यामा जीवितोषधम् ॥ . . जाते हैं। शीतले तनुजान रोगान नया हर्रास नुसरान। . जिस शीतला रोग पीली सरसोंकी तरह दाने निक- { विस्फोट कविगीर्यानां त्वमेकामृतपपिपी ॥ लते हैं उसे सर्पपिका कहते हैं । इस रोगमें अभ्यङ्ग निषेध गलगपग्रहा रोगा ये चान्ये दारणा नृणाम् । है। कुछ उमासे सफेद सरसोंके आकारका एक शोतला त्यदनुध्यानमालेण शीव यान्ति ते क्षयम् ॥ . रोग होता है। यह मायः थालफोंको हो हुमा करता है। नमन्त्री नौप फिधित् पारोगस्य विद्यते। . ! यह सहज पूरा जाता है। जिस शीतला रोगमे फोड़े ज्य त्वमेका शीतले पात्री नान्या पश्यामि देयताम् || । होकर दर्द के साथ लोदितवर्णके निकलते हैं, उसकी मृणाततन्तुसटशी नाभिहन्मध्ये, संस्थिताम्। पछी शीतला कहते हैं। मगध इसको दाम कहते हैं। परत्या विचिन्तयेद्दपी तस्य मरमुन जायते . ' भीसप पठितव्य भक्तिसमन्यिो इस रोगमें तीन दिन ज्वर रहता है। उपसर्गविनाशाय रं सरस्ययन मात् ॥ जिस शोतलामें सव फोड़े फैल फर एफमें मिल सीमानायसदिन देव यस्य कस्यचित् । जाते हैं, उसको चर्मजा करते हैं। युकप्रदेशर्म यह..: । दातव्यं हि सदा सस्मै भक्तिभदायिवा दिया." चरमगोटो नामसे प्रसिद्ध है। . स्कन्दपुराणे कागीरापडे शीतशादरस्सीप एमागम ___सार तरहका यह रोग होता है और पादि।

(भारका मगरिकारोगापिक शीतलादेयीको पूजा फरनेसे दी .....है। " यह स्तयपाट ही शीतलाका एकम कुछ शीतला रोगजन्द i. :: . होने पाप, इसके लिये टो ........ गीस्ताना तथा नरमा नोंदोता। . . 1 कुछ देरते। कुछ ऐसे है. ..