पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५०४

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४४६ . मायावाद. है, "अज्ञानको विपशक्ति. नश्वर ब्रह्माण्डकी सृष्टि विषय होनेसे समणि और पृथक् धुद्धिका विषय :होनेसे । फरती है।" मकड़ो जैसे अपने चैतन्यके फलसे अपने :व्यष्टि, स्थावरजङ्गमः समूचे प्राणियोंके सूक्ष्म शरीर, उत्पादन तन्तुओंका निमित्तकारण और शरीर द्वारा सूत्रात्मा नामक हिरण्यगर्भकी बुद्धि के विषय होनेसे उपादानकारण है वैसे ही परब्रह्म भी अपने अज्ञान । समष्टि और प्रत्येक जीवके अपनी अपनो बुद्धिका विषय (माया) द्वारा सृष्टिके उपादानकारण और. चैतन्यके । होनेसे व्यष्टि होती है। ....:. .', - सानिध्यमे निमित्तकारण होते हैं। मकड़ी अपने लस्सा. समष्टि सूक्ष्मशरोरोपहित चैतन्य सूत्रामा, हिर- दार पदार्थोके घलसे तन्तुओंको सृष्टि करती है वैसे ही पयगर्म गौर प्राण नामसे प्ययहत होता है। सूतेकी तरह आत्मा भी चैतन्यके सन्निधानफे प्रभावसे 'मायिक प्रत्येकके अनुमस्यूत होनेसे सूत्रात्मा तथा शान, इच्छा, विकार द्वारा विचित्र जगतकी सृष्टि करती है। कियाशक्तियुक्त सूक्ष्म भूताभिमानी होनेसे हिरण्यगर्भ उत्पत्तिको प्रणाली इस तरह है,-तमोगुण बाहुल्य-: और प्राण है। , ....:. . , .:. : . से विक्षेपशक्कियुक्त अज्ञानोपहित चैतन्यसे पहले हिरण्यगर्भको उपाधिस्वरूप यह समष्टि : कोपत्रय आकाश, फिर आकाशसे वायु, वायुमे,अग्नि, फिर उससे (सूक्ष्म शरीरको समष्टि ) स्थूल जगत्को अपेक्षा सूक्ष्म जल और इसके बाद इन चारोंसे पृथ्योको उत्पत्ति होती होनेसे सूक्ष्म, विशीर्ण होनेसे.शरीर और जामत्-संस्कार- है। फ्रमशः इसी तरह सृष्टि होती है । प्रथम उत्पन्न , रूपी हेतु स्वप्न और स्थूल प्रपञ्चके प्रलय स्थान नामसे पांचो पदार्थको पण्डित लोग सूक्ष्मभूत, सन्मावा और पुकारा जाता है। व्यष्टि सूक्ष्म शरीरमें उपहित चैतन्य अपञ्चोकृत महाभूत कहते हैं। इन सब सूक्ष्म भूतोसे | का नाम तेजस है। तेजोमय अन्तःकरणमात्र हो उसकी जीवका सत्रह अवयचशिशिष्ट सूक्ष्म (पतला.), और उपाधि है। . अर्थात् यह स्थानकालमें फेवल अन्तःकरण- स्थूलभूत ( मोटा ) शरीर उत्पन्न होता है..., जब तक | कलियत विषयका अनुभव करता है। : : :: प्रलय नहीं होता, तब तक तक सूक्ष्म और स्थूल शरीर . इस स्थलमें भी पहले की तरह समष्टि ध्याटि-शरोरके विद्यमान रहता है। वस्तुगत अभेद और तदुपहित चैतन्यका भी अभेद देखना __सत्रह अवयव, जैसे पांच शानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, चाहिये। पूर्वोक्त यन, वृक्ष और उससे अवच्छिन्न पांच प्राण, मन और बुद्धि। चुद्धि और पांच ज्ञानेन्द्रिय आकाश और जलाशय, जल, और उससे प्रतिविम्बित इन सबको समटिको विज्ञानमय कोप., कहते हैं। आकाशके दृष्टान्तमें लेना चाहिये। .. ... ; :: विज्ञानमय कोपको हो इहलोक या परलोक सञ्चारी जीव | .यही सव मायिक है अर्थात् माया द्वारा हो, इस तरहका कहता है। इस विज्ञानमय कोपमें ही 'अहं कर्ता' 'मह ज्ञान होता है। शान हानेसे मायाकी कोई जरूरत नहीं भोक्ता' 'अह' सुखी' इसी तरहका अभिमान उत्पन्न होता होती। है।। मन और पञ्चकर्मेन्द्रियके मिल जानेसे मनोमय कोप |... आत्मासे एकत्व ब्रह्मचैतन्य-मायाका सम्पर्क हुआ है। तथा पञ्च प्राण और पञ्चकर्मेन्द्रियके..मिल जानेसे प्राण-जिस मायाके कारण जोय ,अपना सुख नहीं जानता, भय कोषको सृष्टि हो जाती है। . ... ब्रह्मभाव नहीं जानता और अपनेको मुखदुःख भोका . इन सब कोपोंमें विज्ञानमय कोप ज्ञानशक्तिसम्पन्न जन्म-मरणशील जीप समझता है .इस मायाको फांससे और कखरूप, मनोमय कोप इच्छा शक्तिपिशिष्ट और छुटने पर अपनेको आनन्दस्वरूप समझने लगता है। , कारणरूप, प्राणमय कोप क्रियाशकियुक्त कार्यकप है। इसी, मायासे -इन्द्रजाल ,सदश जन्ममृत्यु · आदि .योग्यताके अनुसार इस तरहको विभागकल्पना हुई। यह कई वाते अघटनसे सघटनकी तरह दिखाई देती हैं, उसका सम्मिलित तीनों कोय ही सूक्ष्म शरीर है। . . ., कौन सीमा निर्धारित कर सकता है ? इसीको मायावाद . इस सूक्ष्म शरीरमें भी बन गृक्षको -तरह या जला- कहते हैं। .:. . . . . . .:.: शय जलको तरह समष्टि और व्यष्टि है। एकत्व-युद्धिका जव जीव जन्ममरणादिकी यातनासे 'संसारके