पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५०५

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मायावाद अंनलमें परितप्त हो कर वेदवेदान्तपारग गुरुके सामने । छुट सकते हैं। जो पापकर्मा, मूढ़ और नराधम है, 'उपस्थित होता है। तव गुरु कृपा कर उसको प्रलोप- जिसका ज्ञान माया द्वारा अपहत हुआ है, वह मेरा भजन देश प्रदान करते हैं। शिष्य ममसे श्रवण, मनन और नहीं करता है। इसका तात्पर्य यह है, कि भगवान् नित्य निदिध्यासनादि द्वारा मायाके इन सब कार्योको समझ शुद्ध मुक्तस्वभावके हैं । फिर भी यह मिथ्या ज्ञानमय जगत् सकता है । अक्ष.नयशतः रस्सोस सांपका भ्रग होता है | किस तरह उनका विजुम्मण हुमा ? अर्जुनका यह उसी तरह मायाधेशमें एक, अद्वितीय, सच्चिदानन्द, ब्रह्ममें सन्देह दूर करनेके लिये भगवान्न अर्जुनसे कहा था, 'जो जगत्को भ्रान्ति होती थी, उसको निवृत्ति होती है। । कि जीव लिगुणमयो मायासे मोहित आत्मानात्मवियेक वेदान्तसार और वेदान्तदर्शन देखो। । विहीन हो मुझको पहचान नहीं सकता। जैसे ग्रीष्मके सांख्य प्रवचनभाष्यमें विज्ञान-भिक्षु इस मायावादको प्रचण्ड मातएडके तीन तेजकी ओर देखनेसे उसी में प्रच्छन्न बौद्धमत कहा गया है। उसके मतसे यह मुग्ध हो जाता है, यथार्थ सूर्यको देख नहीं सकता, धैसे बौद्धोंका पफ प्रकारका मत है। मतपय यह मिथ्या है। हो त्रिगुण घ्यापारसे विमोहित हो कर जीव जिसका .. "मायावादमसच्छास्तं प्रच्छन्नं बौद्धमेव च। आश्रय ले कर यह गुण प्रकाशित किया हुआ है, उन्हीं मय व कथित देयि ! कली ब्राह्मणारूपिणा ॥" (विज्ञानभिक्षु), भगवान्को लक्ष्य नही कर सकता। ___पुराण शब्दमें पद्मपुराणका विवरण देखो। वे लिगुणके अतीत और विगुणके अधिष्ठानभूत भो कलिकालमें 'ब्राह्मणरूपो शङ्कराचार्यने इस असत् है। किन्तु मायासे विमोहित जीव उनको देख नहीं मायाको प्रकाशित किया है। इससे जीवफा निश्श्रेयस लाभ, सकता। जैसे स्वर्ण-कुण्डलमें 'कुण्डल' दिखाई देनेसे दूर.भागता है। सांख्यके मतसे यह जगत् सत्त्वरज- वर्णका शान नहीं रहता, धैसे हो त्रिगुणमयी दुष्टिक स्तमोगुणात्मिका ' प्रकृतिसे. उत्पन्न है। प्रकृति और ' भागे ब्रह्म नहीं दिखाई देता। पुरुषका पूर्णशान होनेसे मुक्ति हो जायगी। ...: ____ सनातनी माया, जैसो दुरतिपाय है, इससे वह । घेदान्तफे मतसे मी सत्त्व, रज और तमोगुणमयी किसी तरह मुक्त नहीं हो सकता। अर्जुनके इस माया है । जीय जब यह समझ जाता है, कि यह माया.या सन्देहको दूर करने के लिये भगवानने और कहा है कि अडानका कार्य है तय उसका मोक्ष होता है। . . . मायाको विशुद्ध चैतन्याश्रिता विषयकी मूल प्रसूतिकी , शङ्कराचार्य और वेदान्त शब्दमें विशेष विवरय्य देखो।। कल्पना को.जा सकती है। उसका नाम देवीमाया। •; मगवद्गीतामें लिखा है-- . | जैसे अन्धकार जिस घरमें रहता है, उसी घरको आच्छन्न ___ . "विभिगुणमय र्भावरेभिः सर्वमिदं जगत् । । फरता है। जैसे रस्सीको तिगुना ऐंठ कर मजबूत.यना ___., मोहित नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ , कर उससे मनुष्यको बांध सकते हैं वैसे भगवानको . देवी ोपा गुणमयी मममाया दुरत्यया । । त्रिगुणमयी माया द्वारा जीव भी मजबूतीसे बंधा हुआ . मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेता तरन्ति ते ॥ . है। सर्वावरण. छेद कर आत्मा और परमात्माका न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । साक्षात् न होनेसे मायाका बन्धन मुक्त नहीं होता.। जो ..मायपापद्दतशाना आसुर' भावमिश्रिताः" जीव अनन्यकर्मा हो कर भगवान्के शरणापन्न होता है (गीता ७१३.१५) । जिस जीवको भगवानको भक्ति के बिना किसी तरफ,ध्यान विविध गुणमय भावने ही जगत्को 'मोहित फर; नहीं रहता, पुण्य कर्ममें सदा अनुरक रहता वही जीय रखा है। मुझको (ब्रह्म) इसको अतीत और अध्यय मायावन्धनसे मुक्त हो सकता है। समझना। मेरो सस्वादि त्रिगुणमयी माया नितान्त जो पापासक्त है और जिसका पापकर्ममें ध्यान रहता दुरतिक्रम्य है। जो मनुष्य केवल मेरी शरणमें रह कर है.वह नराधम है। यह अपना इष्टानिष्ट.समझन अस.. मेरा भजन करते हैं, घे ही इस मुदुस्तर मायाको फांससे मर्थ है। उसका विषेक माया द्वारा दूषित होने के कारण