पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५१५

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पारवाड़ समय राठोरों और मुसलमानोंके रक्तको नदी यह ) लूटा गया। बादशाहकी रक्षाके लिये कोई मुगल अमीर गई थी। उमराव प्रत्यक्ष रूपसे मागे न बढ़ सके। फर्सबसियर सन १६८० में अत्याचारी यादशाह औरङ्गजेबके की हत्याके वाद मुगल अमीर लोगोंने मिल कर निको.

उत्पीड़नसे यशवन्तसिंह और उनके पुत्र मार डाले गये। शाहको आगरेमें बादशाह मनाया। लेकिन दोनों सैयदोंने

बादमें गर्मस्य वालक अजितसिंह जातकर्मके श्रादरफिउद्दीलाको बादशाह बना गरेको मोर दलवलके "राज्याधिकारको प्राप्त हुए। साथ यात्रा की। मुगल लोग डर कर निको शाहको . पालक मजितसिंहके शासन समयमें राज्य भरमें गड़- अजितसिंहफे हाथ सौंपनेसे घाध्य हुप । इस समय - बड़ी मची । बादशाह औरङ्गजेबने सेनाके साथ मारवाड़ वादशाह रफि उद्दौलाने प्राणत्याग किया। तब अजित. पर चढ़ाई कर दी। मुगलसेनाने जोधपुर आदि नगरों सिंहने दोनों सैयद भाइयोंको सहायतासे महम्मदशाहको को लूट लिया। बादशाहने राठोरोंको हरा कर उन्हें । हिन्दुस्तानका वादशाह बनाया। । मुसलमान बनानेको आज्ञा घोपित को। इस संवाद पर सम्बत् १७८०के आपाढ़ महीनेमें अभयसिंहको उत्ते. .. मरवाडके सामन्त लोग और राजपूतानेके सभी राजपूत | जना और राज्यलाभको लालसासे उसके भाई भक्तसिंह- ' सर मिल कर मुगलशक्तिके वियद्ध खड़े हुए। जय ने वोरकेशरी वृद्ध पिताको विप खिला कर इस लोकसे .पुर, जोधपुर और उदयपुरके राजोंने एक सन्धि को और ] विदा किया। मुगल बादशाहसे स्वाधीन होनेकी चेष्टा करने लगे। इस अजितसिंहको इस तरह निष्ठुरतासे मरवा कर अभय- सन्धिकी शाके अनुसार उदयपुरके राणाशके साथ सिंह सन् १७२५ ई०में गद्दी पर बैठा, लेकिन वद सुख- 'मुगल सम्बन्धसे कलुपित जयपुर और जोधपुरके राजाओं-1 से राज्यभोग न कर सका । १७२८ ६०मैं अपनी वीरता को सन्तानोंका वियाह होना निश्चित हुमा । इस सन्धि के पुरस्कारमें इन्हें 'महाराजराजेश्वर'की उपाधि मिलो। के बल पटरानीके पुत्र अभयसिंह हो मारवाड़को राजगद्दो बादमें अपने भाई भक्तसिंहके विरोधसे इन्हें बहुत कष्ट । पर बैठे। सहने पड़े। मेवार, सम्बर और मारयाड़में मेल हो जाने इस समयसे अजितसिंहकी भाग्यलक्ष्मी प्रसन्न | पर इन्हें फिर रणक्षेत्र में उतरना नहीं पड़ा। सन् १७२० हुई। बादशाह औरङ्गजेवको अपनी जवान पोती (अक। ईमें योधपुर नगरमें इनको मृत्यु हुई। मालूम होता है, घरफो लड़की)के सतीत्व भ्रष्ट होनेके डरसे अजितके माथ कि उक्त राजाओंमें आपसमें विवाद था, तभी तो उन्होंने सन्धि करनी पड़ी। यादशाहने अपनी पोतोको वापस | दिल्लीकै यादशाहकी अधीनता स्वीकार कर ली थो। यह पा मजिवसिंहको उनकी पहले ली गई वहुत-सी सम्पत्ति | विद्वप-ज्वाला वंशपरम्परासे चली आ रही थी। लौटा दी। शाहजादा स्वयं अजितसिंदको जोधपुर ले गभयसिंहके मरनेके बाद उनके लड़के रामसिंहने गपे थे। 'मारवाड़-राज्यसे युद्ध किया। युद्धमें हार खा कर ये प्राण औरंगजेयके बाद शाह आलम गद्दी पर बैठा। इस ले भागे। तय भकसिंह मारवाड़ी राजगही पर बैठे। ये नये वादशाहसे अजितसिंहका कोई विशेष वादविवाद भी पिताको हत्याफे प्रायश्चित्तम १७५२ ई०को थिप बिला नहीं हुभा। शाह आलमके वाद भजोम उस्सान वाद कर मार डाले गये। बादमें इनके लड़फे विजयसिंह सिंहा. 'शाह हुआ। जीमने इनसे सन्तुए हो इन्हें गुजरातका | सन पर बैठे। रामसिंह राज्य-लोभसे आगे बढ़े और 'प्रतिनिधि धनाया। अजितसिंहने बादशाह फर खसियर- दोनों भाइयों के विरोधस युद्धाग्नि भभक उठी। राय विजय को धनरल उपहारसे सन्तुष्ट कर अपने हाथ कर लिया। सिंहफे राज्यकालमें मारवाड़ आपसकी लड़ाई के कारण • पोछे इन्होंने पड्यन्त्र कर सैयद अली खां मौर। भस्मीभूत हो गया। सन् १७९२ ई०में विजयसिंहको हुसेन अलो बाकी सहायतासे दिलो पर चढ़ाई की। मृत्यु होने पर भीमसिंह अपने बड़े भाईको युद्धमै हरा कर दिलोमें सूनको नदी यह चली और सरकारी खजाना । गहो पर धैठे। भीमसिंदफे मरनेके वाद सन् १८०३ इन्में