पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


५४ मस्तकावर-मस्तिष्क ___ एलोपैथिक मतानुसार वर्तमान सरीरतत्त्वों का ! मस्तमूलक (सं० सी० ) मूलमेव मूल स्पा फन, मस्त इस विषयमें यद्यपि एक मत नहीं है, तथापि उतनी / मूलफा । मस्तकका मूल, गरदन। पृथयता भी नहीं देखी जाती। ये लोग भी करोटो मस्तरी ( हिं० रनो) धातु गलानेको भट्ठी!.. ( Cranium) और मुम्बमएडलके समस्त फलको मस्तापदणं (महम्मद शाकी) मुलतान यहादुर शाहकोय मस्तक कहते हैं। मस्तकके ऊपरी भागमें चमड़े से । इनातुल्ला बांका मुशी। इन्होंने 'म-अगिरी-आलम ढकी हुई जो करोटी चा कपाल नामक अस्थि तथा नामका अन्य लिया है। इस प्रन्यमें आलमगीर अथ Durn mater नामक छोटी मातृका है, यह सामान्य औरङ्गजेवके शासनकालको घटनाएं संक्षेपमें पर्यात कारण पा कर ही उत्तेजनाको प्राप्त होती है। इन सय गई हैं। १० वर्ष तक पादशाहफे साथ रह कर इन के साथ मस्तिष्कका संयोग रहनेसे जीयदेव शोध ही अपनी मांगों से अनेक विषय पर्यवेक्षण किये थे। और विकृत हो जाती है। इन्द्रलुप्त, काउर, संन्यास, मृगी, जेवके उत्साहस हो इन्होंने पुस्तक लिखने में व उन्माद आदि रोग मस्तिष्कके विगड़नसे ही होते हैं। लगाया था। उनको मृत्युफे तीन वर्ष बाद यह पुल लगातार धूपमें घूमने तथा शरीरके भीतरी कोडेसे। समाप्त हुई थी। मस्तकमें जो रोग उत्पन्न होता है, अगरेजीमें उसे ___और जेयके दाक्षिणात्ययिजयका यथायथ पर Injuries of the head कहते हैं। उक्त प्रन्यर्भ रहने पर भी लेखक महाशयने सत्यकाम ___ मस्तिष्क और शिरीरोग देखो। लाप करके पाद शाहको जो सब विपद झेलनी पड़ी मस्तफयर ( स० पु. ) शिरोग्यथा, सिर में दर्द। उसफा यिलकुल उल्लेख नहीं किया है। उसका का मस्तपस्नेह (सं० पु०) मस्तकस्य म । मस्तकका स्नेह, ! यह है, कि औरङ्गजेदन अपने शासनकालको १० वर्ष वाय मस्तकके अन्दरका गूदा । राज्यसम्बन्धीय कोई घटना तथा साना जीयमा मस्तकाव्य (सं० पु० ) मस्तकमिति आख्या यस्य । पृक्ष हास लिखने से प्रत्ययारोको मना कर दिया था। फिर फा सिरा, पेटका ऊपरी भाग। मस्ताद गाने निषेध रहने पर भी दाक्षिणात्ययिजयः मस्तगढ़-पसायके पशहर राज्यके अन्तर्गत एक दुर्ग। वर्णन करना छोडा नहीं। या अक्षा ३१.२०3० तथा देशा० ७७° ३६ पू० मस्तानाय सा-१क मुसलमान-कयि । ये नया मस्त म रालकिकाएड पर्वतके उत्तर ऊँचे शृङ्ग पर भव- जाय यहादुर नाममे मशार थे। इनके पिता स्थित है। पशहरके गुरसाओंके अधिकारमुक्त होने पर नाम था हाकिम रक्ष्मन् । इन्होंने 'गुलिस्तानो हम- यह दुर्ग भी उनके हाथ लगा था। यह समुद्र से प्रायः नामक प्राय लिा1 उन परयमें इन्होंने अपने पित ६ हजार फुट ऊंचा है। का जीयगचरित भीर रोहिलयासी अफगानाका इनिद- मस्तगी (म० सी०) एक प्रकारका यढ़िया गांव । यह एक वर्णन किया। मशारकी सदावहार झाड़ीफे तनोंको पाछ कर निकाला | मस्ताना ( फा०वि०) १ मस्तकासा, महतोको तरका जाता है। उत्त माझी भूमध्यसागरफे आस पास २मस्त, मरा! (मि.) ३ मरती पर माना, मतदान प्रदेश में पाई जाती है। यह गोंद यानिशर्म मिलाया मस्ति (सी० ) मस प्रितन् । परिमाण । जाता है और भोपाधिफे रूप में भी काम भाता है। दांवोंफ मस्तिक (दि. पु०) मामाक देगे। भनेक रोग में यह बहुत उपकारी होता है। ससे दांतोंका मस्तिकी (१० सी० ) मसगी दे। दिलना, पोड़ा, दुर्गन्ध आदि दूर होता है । अलावा इसके मस्तिष्क (स .) मात मम्फ यति raree और भो फरोगों सार घ्ययहार किश माना है। मानोति रागी का, पूगेदरादित्वात्मानमाला मस्तदार (सं० लो० ) मस्त मस्तकमिप उ दाय। मगध । गर्गाय-गो देशदादा

.