पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५२३

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मारीच्य-मारुत अकुश, तीर और सूची तथा यायें हाथों • अशोकपत, मारुगड (सं० पु. १ १ मण्ड, सांपका अडा।२ पाया, धनुप और तर्जनीमें लपेटा हुआ सूता है। शिर पर वैरो. रास्ता । ३ गोमयमण्डल, गोबरका घेरा। चन मुकुट है। सभी भुजायें विविध माभूगों से मुशी मारुत (संपु०) मरुदेव ममत् (प्रज्ञादिभ्यश्च । पा ५४.३८) मित हैं । वे रथ पर यैठी हुई हैं । सात शूकर उनके वाहन इति स्वार्थे अण। वायु । इसको संख्या उनचास है । इनक हैं। रथ पर राहु भी है जो चन्द्र और सूर्यको निगलना जन्मविवरण भागवतमें इस प्रकार लिम्बा है, कश्यपकी चाहता है। उनके चारों पार्श्वमें चैनाली, वरालो, बदाली स्त्री दितिने सेवा-टहल द्वारा अपने स्वामी कश्यपको प्रसन्न और वराहमुखी नामको देवी खड़ी हैं। . किया और इन्द्रहन्ता एक पुत्र के लिये उनसे प्रार्थना की। मारोच्य (सं० पु० ) १ मरोधिका गोवापत्य । २ अग्नि- कश्यपने कहा, 'यदि तुम मो वर्ष तक नियमपूर्वक मतका प्रत्ता। . .. पालन कर सको, तो तुम्हारे गर्भसे इन्द्रहत्यामागे और मारोमय (सं० पु.) मारीके लिये भय । मरो अर्थात् ! अति परराक्रमो एक पुत्र उत्पा हो सकता है। किंतु याद हमा होनेसे जो भय होता है उसोको मारीभय कहते हैं। रहे यदि बीवमें तप भंग हो जाय, तो फल उलरा होगा।' मारोमत (सं० विमारीमै मृत, जिसको महामारीमें! कश्यपके कथनानुमार दितिने 'वैसा हो 'गो' कह कर मृत्यु हुई हो । साधारणतः संक्रामक रोगको हो महामारी | व्रत आरम्भ कर दिया। कहते हैं। इन्द्रको यह यात मालूम होने पर चे कपट साधुके "भय पञ्चमे नृपभर मारीमृतदर्शना वक्तव्यम् । वेशमें दितिके आश्रममें गाये और उनको परिचयां करने पष्ट तु मय शेय गन्धर्वाणा महोम्यानाम् ॥" । लगे। इस प्रकार कुछ दिन वोत गया। इंद्रने दितिके ... , . . ... . ...( गृहत्स'०८३३) । उदर में घुसनेका किसी प्रकारका छिद्र नहीं पाया। एक मारीय (सं०नि०) कामदेव-सम्बन्धोय ।। 7 दिन देवात् दितिके मोह उपस्थित हुआ। इन्द्रको अच्छा भारीप (सं० पु०) मारिष शाक, मरसा साग । पर्याय- मौका हाथ लगा। उसी छिद्रसे थे योगमाया द्वारा मामप। .. दितिके उदरमें घुस गये। दिति बेहोश पड़ी थी, मार-हिन्दीके एक कवि। ये वहत सो कविता वना गये कुछ भी न जान सकी। उदरमें प्रविष्ट होते ही इन्द्रने हैं, उदाहरणार्थ एक नीचे देते हैं। गर्भको सात खण्डोंमें काट डाला। करा हुमा गर्भ- खएड रोने लगा। इस पर इन्द्रने 'मत रोयो' मारू म्हारे पालो है राज इस प्रकार अश्वासन दे कर प्रत्येकको फिर सात खण्ड 'बागों मागों केवडाजी काई साया 'ऊपर फूल गुमायो नाजक पोंचा पकर लियोजी काई अजर करे पिया। प्यारी घूघटदो जोर करे ये म्हारा सिरताग इन्द्र जब उन्हें फिर काटनेको तैयार हुप, तप खएड- मारुक (सं० वि०) मृत्युमुखो, मुमूर्षु । गर्म कृताञ्जलि हो कहने लगा, है न्द्र ! तुम हम लोगी. मारजी-एक हिन्दी कवि। इनकी कविता बड़ी मधुर का पयों विनाश करते हो? हम मरुद्गण हैं, आपके होती थी। उदाहरणार्थ एक नीचे देते हैं। भाई हैं।' इन्द्रने उत्तर दिया, 'मत डरो, तुम लोग मेरे पार्षद होगे। भगवानकी कृपास ये मद्गण इनके साय . मारूजीने कालो हा जी म्हारा राज मारूजीने मिल कर उनचास देवता हुए। पीछे वे सबके सब कहजो समझाय भासमानी हरी । दितिके गर्मसे बाहर निकले। . . . . . . रज सुवे जी छान डेरांकी। __ऊँचा थारा तो तम्बू अरद पनात दिति गमो सो रही थी। हठात् उनको नोंद हटो .. हो हो भासमानो डोरी रक्षा और अपने कुमारों के साथ न्द्रको देसा। कुछ समय किया।