पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५३४

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४७९ मार्गशीर्षक-मार्जन मार्गशीपक ( स० पु०) मार्गशीर्ष स्वार्थे कन् । मार्ग- : मार्जक (सं० त्रि०) मार्जनकारी, साफ करनेवाला। शीर्ष मास, अगहनका महीना । (पु० ) २ रजक, धोयो । ३ सम्मार्जक, झाड़ देनेवाला। मार्गशोधक (सपु० । पथ-परिकारक, माड्दार । मार्जन (सं० क्लो०) मायने इति मार्ज भावे ल्युट । परि- मार्गशोभा ( स० स्त्री०) सम्मान प्रदर्शनार्थ पथसजा, फरण, साफ फरनेका भाव। पर्याय-माधि, माटी, सम्मान दिखाने के लिये रास्तेको सजाना । ! मार्जना, मजा, मार्ज, मार्जा ( अमर ) । मार्गहा (तमलो०) पथस्थित गृह, रास्ते परका घर। स्नानकालमें शरीरको अच्छी तरह मलना चाहिये। मार्गागत ( स० तिः) पथसे उपस्थित। ' इससे शरीरको दुर्गन्ध, गुरुना, ग्युजली, दाद आदि मार्गायात ( स० वि०) पथ विस्तृत, चौड़ा रास्ता। । चमड़े का रोग तथा अरुचि और स्वेद विनष्ट होता है। मार्गार । सं० पु० ) मृगादिका अपत्य ।। , "दोर्गन्ध्य गौरव कपट कच्चा मनगरोचकम् । मार्गिक ( स० वि० ) मृगान् हन्तोति मृग (पत्तिमत्स्य- स्वदं वीभत्सता हन्ति गरीरपरिमार्जनम " मृगान् हन्ति । पा ४।४।३५) इति ठक् । १ मृगहन्ता, भृगों (राजपाम). . फो मारनेवाला। २पथिक, यात्री। । भावप्रकाश लिम्बा है-स्नान करनेके याद मगोछेसे मार्गित (सं० वि०) मार्ग अन्येपणे त । अन्तेपित, खोजा । शरीरको अच्छी तरह पोंछ डालना चाहिये। इससे दुआ। शरीरको कान्ति बढ़ती है और ग्युजली दाद आदि चर्म ... भागितथ्य ( सं० लि. ) मागंतव्य । अन्येपणाय, गन्यपणके रोग जाते रहते हैं। शरीर पोंछ डालनेके वाद . योग्य। यहा पहनना उचित है। मागिन् (सं० पु०) मार्गगामी, मार्ग पर चलनेवाला व्यक्ति, "स्नानस्यानन्तरं सम्यग वस्ले नागस्य मार्जनम् । यटोही। कान्तिप्रदं शरीरस्य करइत्यग दोषनाशनम् ॥" . . मागी (सं० पु०) १ मागिन् देखो । (स्त्री०) २ संगोतमें ( भावन०) एक मूछना। इसका स्वर ग्राम इस प्रकार है-नि स। देवगृहमार्जन अतिशय पुण्यजनक है। स्रो या पुरुष . रेगमपध। म प ध नि स रे ग म प ध नि सा जो कोई व्यक्ति प्रतिदिन देवगृहमार्जन करता है उसफ मागीयच (सं० सी० ) सामभेद, एक प्रकारका साम सभोपाप जाते रहते हैं। अन्तमें उसे स्वर्गकी प्राप्ति । गान । मार्गेश (सं० पु०) मार्गस्य ईशः। मार्गप, मार्गपति ।। होती है। अतपय सभोंको चाहिये, कि ये प्रतिदिन देय मार्गोपदिश ( सं० पु० ) उपायोपदेष्टा, उपाय बतलाने | गृहको परिष्कार करें। "मंमार्ज नन्नु यः कुर्यात् पुरुषः केशयालये। बाला। रजम्तमोम्यो निर्मुक्तः स भयेनात्र संशयः॥ . मार्य (सं० वि० ) मुज्यते इति मृञ् ( गजेबिभाग) प्रति पाशूनां यारता राजन कुर्यात् गमाज में नरः । पक्षे पपत् गृद्रिश्न (जोः कुधियगयतोः । पा ७१३३५२) इति । तावन्त्यन्दानि स सुखी नाकमागाय मादन ॥" पुत्वं । १ मार्जनीय, मार्जन करने योग्य । २ शान्येपणीय, (विधातर) हरने लाया। मा .पु गरेजीका तीसरा गाम, फरवरी सभी मामलों पर परमे कहा, यि चमार्जन याद और अप्रेम पाले परोयाला अंगरेजी महीना।। कम्गेमे अशेष पुष्य होना । यिम्नार हो जाने भयः .' पद मायः फागुनमें पड़ता है। २ गमन, गति ।३ सेना- से यहां पर कुल पंचन उम त नहीं किये गये । इग्भिनि- का प्रस्थान. सेनाका कूच । बिलासमें विस्तृत विवरण दिया गया। माज (म. पु०) मार्जयति पापरलं प्रक्षाल्य उद्धरति जना स्नानविशेष | शारीरिक अनुस्थता कारण जिम निति मार्मणि अगाविण | मायति यसमल- दिन स्नान म पर सफे उस दिन शरीरको धो लेना . मिति मा मच् । २ रजक, धोयी। . ३ मार्गन। चाहिये। यदि यह भी न कर सके तो गोले भगोडेसे