पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५४२

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मानञ्चा--मालती मालचा---गद्दीविशेष । फपोनाक्ष नदी जहां समुद्र | कर जमीन पर फैला देना होता है। एक मेर अनुनरः गिरती ६ उम मुहाने निकटवत्तों प्रवाहको मालना तलमें पाय भर मुरासार मिला देना चाहिये। उसके गाने हैं। विद्याधरोपदीफे माप मालाका संयोग ऊपर नाजे फूल विछा देते हैं। मनन्तर प्रोकालको है। मालचा रायमल मुहानेसे दो कोस पूर्वमें अब फलो धूप १५ दिन तक सुसादेसे ही नेल तयार होता स्थित है। पहल तथा माचाफे मध्यरत्ती पाटनोद्वीप है। ऊपरका जश तेल रूपमें और पानफे नीचे जो पनी फे ममीप १७६६०में फालमाउथ ( Pal mouth)/ तह जम जाती है यह 'पमेटग' या पतलमा यात जहाज हर गया था। होता है। सुमा यूरोपयासियों के पक्षमें जासिकुसुम मालया ( रनो०) एक प्रकारको लाल रंगको नारंगी। वासित रमाल सम यह देगने में सुन्दर और पाने में पटुन स्वादिष्ट होती है। मालतीपुष्प भनेक प्रोपर्धाम व्यवाहत होता है। हिन्दू गुजरांवाला और लगनऊमें यह पटुतायतसे होती है। और मुसलमान लेषकगण भैषज्यतत्यमें मुक्त कराठमें मालतिका (सं० रखी० ) स्कन्दानुचर मातृभेद, फार्तिकेय इसका उल्लेख पर गपे हैं। शरीर के किसी स्थानमें को एक मातृभाका नाम। इस तेल का प्रलेप देने से यद स्थान यदुत ठंढा हो जाता मालती (सं० बी०) मलते शोमांधारयतीति मल (भ है। मुग्यमें यदि किसी प्रकारका फोड़ा हो गया हो, तो रभियजीत्यादि। उगा १९.) इत्यत्र बाहुलफान् मल- इसके पत्ते को घोमें भून कर चथानेसे यह अच्छा हो तेरलन् गौरादिनिपातनापधाया दोघंत्य, इति । ज्ञाता है। जाड़े के समय इस तेलको मुखमें लगानेरो उज्यलदत्तोपतः मतन, उपधाया दीर्घत्वं डीप च या मुग्प कमो भी नहीं करता। वैद्यक, इस कार, पित्त, मां लक्ष्मी लाताति मालो विष्णुः तं अततीति अब ।। मुखरोग, मण, प्रिमि और कुटनाशक माना है। अधिकता होती है। यातुफे प्रारम्मगे इसमें फूली पद्मपुराणके उत्तरखण्ड में लिखा है,-गौरी, लक्ष्मी फे प्रौद लगते हैं। पल सफेद होता है जिसमें पंव. और साधा ये तीन देयो धाली, मालती और गुलसी- ड़ियां होती है। पाड़ियों के नीचे दो मंगुलका लम्या वृक्षरूपमें उत्पन्न हुई है। मा अर्थात् लक्ष्मीसे उत्पन्न इंठल होता है। जब फूल मढ़ जाते हैं, तब पक्षफे नीचे दोनेके कारण इसका नाम मालती भा है। पृलोका पिछीना-सायिक जाता है। इस लताफे फूलने । "तिमभ्यस्तर योजम्यो यनस्यस्पररयोऽमपन। । पर. भोरे भोर मधुमपिसयां प्रातःकाल उस पर चारों भोर धाश्री च माती व नुतणी च नृपोत्तम् ॥ . . . गुजारती फिरती हैं। धायुभगा स्मृता पापी मा-मना गाती रमृगा। अति प्राचीनकाल में भी जाति पुष्पसे गन्धर्वल और ' गौरीमया नु गुप्तगीजस्यतमोगुणाः ॥" पुषसारादि तैयार होता था। जातिपुसम मिधित रोत (परपुरागा उरग १४६ म०) मस्तिको रंडा सता, इमोस मिलासी भारतवासी' या लता उगानों लगाई जाती है। पर इस.पो.नी. चादरपूर्वक इमका ध्यपहार करते है। यूरोप में भी जाति के लिये यहे गृक्ष या मगदप शादियों मारश्यकता होती पुपका पात सादर है। स्पेनदेशमें इसको पातायतसे है। यह पवियों को बड़ी पुगनी परिचित पुष्पलता है। तो amiti एक योगा जमीनमें से ! मन ल कालिदाग ले फर भान तामे प्रायः सगो कयियों. Eart भार १५२ मतकलाम दी सन्नाह ! ने भानी कविता मा गणन किया है। . पसगी प्रदान करने आधी मिली हुई बलियो एक और प्रकारको माटगी नि पानमालती योगी कार रम पर दो तीन दिन अन्तर पर फल Jauminum huntile करते हैं। संस्टा पर्याग--- - मना होगा। इस प्रकार यानी पुष्पको सुगंध.: यूशिमागपुणिमा मसी लगा दिमाश्यप्रदेश में २०००. पोगनी। पोछे उसे धीमी गान, गलाते हैं। मे १००० पुटको गापा फ्रामीर मेपाल मा दिमा मल किम्ली का को अनूनक रोलम भिगो देता है। भारगयो प्रायः सो स्यानामि तथा सिहल ,