पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६०४

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५३२ __पाहिपिका–माहिप्य स्त्रीधनोपजीयो, जो स्रोफी गृत्ति द्वारा उपार्जित धनसे ६००० लीग या ५०० मील था। उस समय भी इसका अपनी जीविया निर्वाह करता है उसीको माहिषिक गिनती एक स्वतन्त, राज्यमें थी। चीनपरियाजकने पाहते हैं। लिखा है, कि यहांके अधिवासियोंकी रीति-नीति तथा "महिपीत्युच्यते नार्या भगेनोपार्जितं धनम्। । उत्पन्न यस्तु उजयिनीकी तरह थी । अधिकांश अधि- उपजीवति यस्तस्याः सवै मारिपिका स्मृतः ॥" पासी पाशुपत मतावलम्बी थे। युद्धसे बड़ा ये फिसोको (विष्णुपु २।६।१५) । नहीं मानते थे। यहाँका राजा भी जातिका ब्राह्मण था। मादिपिका ( स० सी० ) एक नदीका नाम। . पुराविद फनिहमके मतसे नगरका वर्तमान नाम मण्डल (राम० ४।४०१२१) है। जयलपरसे हम है। जटयलपुरसे ६ मील दूर त्रिपुरारि नामक नगरीका माहिपेय-१ एक प्राचीन चैयाकरण । विभाग्यरत्नमें इनका अभ्युदय होने पर माहिष्मतोको , समृद्धि विलुप्त हुई । मत उद्धत हुआ है। २ महिपीके गर्भसे उत्पन्न सुन- महाभारतके समय माहिमती भोर वैपुर दोनों स्वतन्त्र जाति । माहिष्य देखो। राज्य समझा जाता था। यथा- माहिष्मती-पुराण-महाभारतादि प्रसिद्ध भारतवर्षकी . "माद्रीसुतस्ततः प्रायाविजयी दक्षिणां दिगम् । एक अति प्राचीन नगरी। भागवतादिमें लिखा है,- लैपुर स यशे कृत्वा राजानमितौजसम् ।। (२१३१६०) यहां हैहयराज कार्तवीयांर्जुन राज्य करते थे। स्कन्द अनन्तर सहदेयने माहिभातीको जीत फर दक्षिणकी पुराणके नागरखण्ड के मतसे यह नगर नर्मदाके किनारे ओर प्रस्थान किया था। पड़े प्रतापी वैपुरराज्यको धे अवस्थित था। यहां रेयाके जल में सहस्रार्जुन यहुत- अपने कायूमें लाये थे सी खियों को ले कर जलमोड़ा करते थे। रावण उनके मादिप्मतेयक (सं० त्रि०) माहिती (कत्त्र यादिभ्यो दफा बलवीर्यको न जानते हुए उनके साथ युद्ध करने आया पा ४१२६५) इति ठम्। माहितीदेशमय, माहिमती और गन्त, सहस्रार्जुनफे हाथ बन्दी हुआ। ( भागवत | देशका । ६।१५।२२०) महाभारत के सभापमें लिखा है, फि राज. | माहिष्य (संपु०) महिप्यां साधुरिति महिपी प्यम् । ख्यकालमें सहदेव यदी कर उगाहने आये थे। उस / अतिविशेष । क्षत्रियके औरस और धैश्याफे गर्भसे इस. समय यहां नीलराज (पुराणोक्त नीलध्वज )-का राज्य | जातिको उत्पत्ति हुई है। था। स्वयं अग्निदेव उनके जामाता थे। अग्निको स्मृति और पुराणसे माहिप्य जांतिके यहुतेरे प्रमाण सहायतासे नीलराजने सहदेवको परास्त किया । भाखिर मिलते हैं। मनु भगवान्ने इस जाति विषयमें कोई मग्निके कदनेसे नीलराजने सहदेवको पूजा की और वात नहीं कही है। उन्हें कर दे कर विदा किया । गरुडपुराणमें इस स्थानको यागवल्ययने कहा है,- एक महातीर्थ पतलाया गया है। (८१११६) "ये याशूद्रयोस्नु राजन्यान्माहियोगी गुती स्मृतौ ।" (१॥९२) यौद्ध-प्रधानताके समय भी मादिप्मती समृद्धि- क्षवियके औरससे घेश्याफे गर्भसे मादिप्य और शालिनी नगरी थी। बहुतसे पण्डितोंका वास होनेके क्षत्रियके औरस तथा शूद्राके गर्भसे उप्र जातिको उत्पत्ति फारण इसका तमाम भादर था। सिंहलके महावंशमें हुई है। लिखा है, कि सन्नाट अशोराने इस महेशमएहलमें (मादि सह्याद्रिपएडमें लिखा है,- "मती मएटलमें) रो महादेवको भेजा था। वीं सदी. "वैश्यायां क्षत्रियान्माती माविन्यस्त्यनुनामजne में चीन-परिवाशक यूएनयुयंग यहां आये थे। उन्होंने भष्टाधिकारनिरतश्चतुःपर यतकोविदा मोहि-नि-क-लो पुन्टो (गदरपुर) के नामसे दम स्थान तयन्धादिकास्तस्य क्रियाः स्युः सकता विगः ॥४५ का उल्लेख किया है। उस ममय इस नगरका परिमाण २०लोग घा ५ मील तथा समस्त राज्यका पग्मिा •Cumingham's.incient Geographs. p. 19..