पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६५८

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५८८ मिल ( utiliterianism ), राजनीति, व्यवहार मात्र यौवनकी उद्दाम कल्पनामें पृथ्वी पर 'भादर्श राज्य ( Principles of Political Economs ) और खाधो- स्थापित करना चाहा था। इसी सङ्कल्पफे वशवत्ती हो नता ( Liberty ) नामकी पुस्तके हो विशेषरूपसे कर वे समाज-संस्कारको आशासे प्रोत्साहित हुए थे। प्रसिद और मौलिक भावापन्न है। 'नारी जातिको उन्होंने मोचा था, कि दारिदा दुःखको दूर कर वे साधा. गधोनता' : Sulyection of Women ) नामक पुस्तकमें रणको शान्ति-सुखका अधिकारी यनायेगे। इसीके उन्होंने ग्त्रीस्वाधीनताके पक्षमें कितने ही दार्शनिक अनुसार उन्होंने तर्कविद्या तथा अर्थनीतिशास्त्रकी तर्क और युक्तिको अवतारणा की है। रचना को भो । रिन्तु १० वर्षों में घे अभिलपित उन्नति . मिल प्रचलित समाजपद्धतिके प्रति दोपारोपण कर | पथकी अध्वशिलाको पार न कर सके। यह देख कर व्यक्तिगत स्वतन्त्रताके पक्षका समर्थन कर गये हैं। उन्हें कल्पना और घटनाका पार्थक्य उपलब्ध हुआ। उन्होंने 'भानो स्वाधीनता' और 'स्त्री जातिको अधीनता'। फिर भी उन्नति प्रवाहकी विलम्बित. और राद्धगतिको नामको पुस्तकों में लिखा है--"सब तरहके समाज-वन्धन देख कर आशा-गा-जनित मानसिक कष्टम न पड़ उनका मनुष्यको आकस्मिक आझांक्षित उन्नतिके याधम है।" उद्यम द्विगुणित हो उठा। इसके अनुसार उन्होंने भवि- किन्तु घे व्यक्तिगत स्वतन्त्रताके पक्षपाती होने पर भी | चलित भाव तथा निर्मीकता साथ स्वाधीनताका मूल स्वेच्छाचारिता और उच्छृङ्गाल के समर्थक नहीं थे। मन्त का। उन्होंने कहा था, कि पृथ्वोका प्रत्येक मनुष्य हो कई चे मानवके भविष्यत् आदर्शसमाजका जो चित्त साधारण म्यत्वों का उत्तराधिकारी ही होता है । उनमें ! अङ्कित कर गये हैं वह इस समय आकाशकुसुम या स्वाधीनता ही प्रधान है। यह स्वाधीनता दो प्रकारको | गन्धर्व नगरकी तरह अलीफ मालूम होता है। किन्तु है,-पक्तिगत और जातीयभेद । किन्तु पुरुष और मानवम मो प्लेटो, कोमते, घेन्थम, टेगर्ट और मिल आदि स्त्रियां अभिनासे इसके अधिकारी हैं । पुरुषजातिने | प्रतीच्य मनोपियों ने उल्लसित भावसे और आशापूर्ण अन्ता- सो याहुत दिनों से अस्वाभाविक और अनुचित नियमोंसे फरणसे उगली दिखा कर उस चिर अभिपित भादर्श- स्त्रीजातिको गरने अधीन कर रखा है यह सामाजिक समाजका पार्थिव स्वर्ग दिखा दिया है। मनुष्य उस कल्पना उन्नतिका सबसे बड़ा बाधक है। जिस दिन लोलामयी स्वर्गमें कव जायेगा, उसके सम्बन्ध मिलने भी पूर्या- प्रकृति पसुन्धराके विशालयक्ष पर नियमके पैर तोड़ चार्यों के पदानुसरण कर कहा है, कि "यदि अनम्त भारत- कर पक्षियोंको तरह . अबाध और असंकुचित रीझमें नन्दनकाननालगत मन्दाकिनी प्रवाहित सुखमय भायसे विचरण करेंगी, उसो दिन पृथ्वोमें मनुष्यके | अमरावतीका होना मम्भव है, तो अनन्तकालस्रोतमें बहु बहुत दिन के अभिलपित स्वराज्यका समागम होगा। संख्यक पुरुषपरम्परा के अलान्त यससे परिदृश्यमान पृथ्यो. यह मत मुक्तकण्ठसे घोषणा कर मिल स्रो समाजके को पोठ पर मुग्नशान्तिपूर्ण स्वर्गराज्यकी प्रतिष्ठा होगी प्रियपात हुए थे। हो। उस राज्यके राजाओं और फङ्गालों में जरा भी फर्फ विश्यमेमो और मानस्तिपो महात्मा मनुष्य नहीं रहेगा। पुरुष और खियां साम्यमायसे अपना जातिको दुःखनिमृति के लिये हो चद्धपरिकर ही कर अपना भाग प्रहण करेंगी। सामाजिक नियोका लोह. लेपनो उठाते हैं। जब पाठगृहको संकुचित सोमा और ड्ल मनुग्यको बासनाको संपत नहीं कर सकता। पाठ्यपुस्तकों की मालानिक मनमोहन दृश्शयलोको पार : वैपन्यकी वाधाविपत्तिपूर्ण मेघमालाका अन्तर्धान होनेसे कर मिल घटनाराज्यके कठोर संग्राममें प्रतिद्वन्द्विता । समुज्ज्वल साम्य सूर्यसमाजों किरणें फेंक कर नरनारी. फरने लगे, तब उन्होंने देना, कि संसारकं चारों ओर के हृदय में निर्मल धानानन्द प्रदान करेगा। घेपम्यका विचित प्रगाव है। मनुष्यका यह मिलने अपने हितयार प्रधागे कहा है,-मनुष्यको पेपर और दैन्य देख व्याकुल हो कर मिलने , यन्त्रणाके जो प्रधान कारण हैं, उनमें अधिकांश हो