पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७२४

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मीपांसा दुसरे स्थानमें उसको या उसके जैसे दूसरेको देखने | · भी देखी जाती है, कि शब्दोंको प्रकृति में विकार पर उसके सम्यन्य अदृश्य पदार्थो का जो ज्ञान होता है। होता है। 'इ' शब्द प्रकृति है 'उ' शब्द उसकी विकृति उस ज्ञानको अनुमिति कहते हैं। आगके साथ धुआं है अर्थात् थ्याकरणमें 'इ' के 'य' होनेका विधान है। उठता है। हम लोग वरावर देखते हैं, कि धुआं और सभी नित्य पदार्थ अधिकारी हैं। शब्द नित्य होता तो आग बराबर साथ रहती है। अव हृदयमें एक वास्तविक इस प्रकार विलासविषयक न हो सकता था। शान सञ्चित रहता है, कि धुआंका कारण आग है, आग । शब्दकी वृद्धि और उसका हास देखा जाता है। धुआंके साथ रहती है। इस सञ्चित ज्ञानके कारण अगर उधारण करनेवाले अधिक रहे तो शब्द यढ़ता पहाड़ आदि पर धुआं देख कर अनुमान करते हैं कि जहां है और कम रहें तो शब्द घटता है। जिसका हास से धुआं उठता है यहां आग अवश्य होगी। यही अनुमिति और वृद्धि होती है यह नित्य नहीं है। है। इस प्रकारको अनुमिति भी धर्मका प्रमाण नहीं हो शब्दकी नित्यताके सम्बन्धों ये मापत्तियां कर सकती अर्थात् इस अनुमानक प्रमाणसे भी धर्मनिर्णय। फिर नीचे लिखे अनुसार उनका खण्डन किया है। शब्द नहीं हो सकता। उधारणके पूर्व उपलब्ध नहीं होता, उच्चारणके बाद समिनिने निश्चय किया है, कि शब्द और अर्थ दोनों उपलब्ध होता है । सिर्फ यही देख कर शब्दकी अनित्यता. ही नित्य है तथा उनका योधकयोध्य सम्बन्ध भी नित्य का निर्णय करना उचित नहीं। इस दर्शनमें नित्यता. अर्थात् स्वाभाविक है। जैमिनिने पहले यह प्रतिज्ञा , का भी विचार हो सकता है। नित्य निराकार शब्द भी फर इसकी ६ आपत्तियां की है और पीछे उनका खण्डन उच्चारणके पहले अक्षात रहता है अर्थात् शब्द उच्चारण किया है। के पहले अश्यक्त रहता है। उचारणचेपासे यह ध्यक्त कोई कोई दर्शनकार (गौतम और कणाद) शायद कह | होता है। अतएव उचारण कियाके वाद शब्दका अनुभव सकते हैं, कि शब्द एक प्रकारको उच्चारण किया है, यह होते देखा जाता है सहो, लेकिन यह शब्दको अनित्यता. क्षणस्थायी है और चेटाविशेषसे उत्पन्न होता है। शब्द का कारण नहीं हो सकता। सारांश यह कि शब्द हम जो नियमाण है वह प्रत्यक्ष है। जैसे उच्चारण के पहले लोगोंकी नित्यताका यह प्रमाण हो सकता है। शव्द नहीं रहता, उद्यारणके वाद अनुभवमें आता है। शम्दक सम्बन्धमें दूसरी आपत्ति भी ठहर नहीं अतएव क्रियमाण और क्षणस्थायी शब्दके साथ मनिय- सकती। शब्द उच्चारणके बाद ही मिनट हो जाता है, माण स्थायी अर्थका नित्य सम्बन्ध सम्भव नहीं। यह भी तुच्छ आपत्ति है। शब्द ना नहीं होता, यह ____ शब्द स्थिर नहीं रहता और मुहर्तकाल भो नहीं। जैसेका तैसा रहता है केवल सुनने में नहीं आता। ठहरता। इसीसे जाना जाता है, कि शब्द पहले क्षणमें ऐसी बहुत चीजें हैं, जो हैं लेकिन इन्द्रियगम्य नहीं है। उत्पन्न हो कर दूसरे क्षणमें अस्तित्वको प्राप्त कर तीसरे 'शब्द फरो' 'शब्द मत करो' यह लौकिक प्रयोग ध्वनि क्षण में विलीन हो जाता है। के सम्यन्ध है, शके सम्बन्ध नहीं। लोग स्थित लोग कहते हैं 'शब्द करा' 'शब्द मत करो'। शब्द शब्दके प्रकाशक ध्यनिविशेषको ही करने कहते हैं, शद फरो, शन्द मत करो इस तरहका प्रयोग पूर्णकालसे प्रच. करने नहीं कहते। लित है और इससे निश्चित होता है, कि शब्द मनुष्य- जिस प्रकार एक नित्यसूर्यको एक समय बहुत कृत है, नित्य नहीं है। स्थानोंमें बहुत लोग देखते हैं उसी प्रकार एफ नित्य एक ही शब्दका एक समयमें यहां, वहां, अनेक स्थानों- वर्तमान वर्ण शब्दको अनेक स्थानों में अनेक लोग सुनते में, अनेक देशोंमें मनुष्य उच्चारण करने हैं और सुनते भी हैं। भी है। अगर शब्द एक और नित्य होता ता इस प्रकार व्याकरणमें दये. स्थानमें 'य' वर्णका विधान है सही पौगपद्य नहीं हो सकता था। प्याकरणको प्रक्रियामें ! परन्तु दोनों वर्गों में प्रकृति-विकृतिका सम्बन्ध नदी।