पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७६४

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पीरट रूप पर लट्ट हो कर इसका पाणिग्रहण किया था। में होती हुई गई है। सिन्धु, दिल्ली और पाप'जानेके विवाहके समय इसने रोमन कैथलिक ‘धर्गको | लिये रेलपथका स्टेशन और सैनिकोंके रहनेको छायनो 'अपनाया था। है। इससे यहां सेना भेजने और व्यवसायको. बड़ी सन् १८०३ ई०से ले कर दिल्लीके अधःपतन होने तफ, सुविधा है। इसका दक्षिणांश महारादियोंके उपद्रवसे अराजक हो उठा | इस समय जहां छावनो वनी है उसके दक्षिण भाग था। इस वर्ष सिन्धुराजने गङ्गा और यमुनाका मध्ययतों में मेरठ नगर यसा है। बहुत पहलेसे यह चारों भोरसे भूभाग अंग्रेजों के हाथ सौंप दिया था। उक्त येगमने सुदृढ प्राचीन (चहारदीवारो) से घिरा हुआ है। इसके सिन्धुरामको बड़ो सहायता की थी। अंग्रेजों के अधि | नौ दरवाजों में ८ दरवाजे बहुत प्राचीन हैं। बौद्धयुगमें फारमें आने वादसे सन् १८३६ ई०में अपने जीवन भर सम्राट अशोकके राज्यकालमें यह नगर समृद्धशाली, अग्रेजोंको उसने साहाय्य किया था। रहने पर भी अंग्रेजोंके गमलमें इसको और भी उन्नति सन् १८९८ ई०में मेरठ एक पृथक् जिला बना दिया ; हुई है। गया। इसके बाद १८२४ ई०में घुलन्द गहर और मुज मेरठ शब्दको व्युत्पत्तिके सम्बन्धमें चार विभिन्न फ्फर नगरसे अलग कर इसको वत्त मान आकार दिया पाख्यानोंकी काल्पनिक सृष्टि होती है। यहांके लोगों- गया । इस समयले सन् १८५७ ई०फे वलयेके मध्य भाग का कहना है, कि इसका पुराना नाम मीरय या मारठ तक यहां कोई उल्लेखनीय घटना न हुई। है। महो नामक स्थपतिने इन्द्रप्रस्थके राजा युधिष्ठिर. प्रजमोहन नामके एक सिपाहीने टोटा काटने की बात- के राजमहलको बनाया था। इसके इनाम या पुरस्कार- को सामने रख यहांके सिपाहियोंको उत्तेजित किया था। में युधिष्ठिरने मोरथ प्रामको दिया था। महोने अपने वों मईको रे बङ्गाल घुड़सवार सैनिकों को हुपम नाम पर इस जगहका नाम मदिराष्ट्र रखा। उसने एक अदुलीके लिये दश वर्ष कैदको सजा मिली। दूसरे अन्दरकोट धनाया था जो आज भी मौजूद है। दिन दलवेका सलाह मशवरा हुआ। इसी दिन संध्या फिर जाटोका कहना है, कि उनके महिराष्ट्र गोत्रीय ५ बजेसे अंग्रेजोका यहां कत्ल आरम्भ हुआ। विद्रोहके । किसो उपनिवेशिकने इस मेरठ नगरको स्थापित किया याद यहां एक बार फिर शान्तिका साम्राज्य छा गया।। था। कुछ लोगोंका कहना है कि यह स्थान बहुत इसके बाद यहां बुलन्दशहरके मालागढ़ सरदार बलो. । प्राचीन फालसं 'महोदन्तका खेरा' नामसे प्रसिद्ध था। दाद खांका भी विद्रोह पड़ा हुआ था, किन्तु यह टिक : इसी शब्दस मोरठ नाम हुआ है। 'महोदन्तका खेरा' न सका। सिपाही विद्रोह देसो। योद्ध-युगका प्राधान्यसूचक है। 'शामस इ-सिराज' के २ उक्त जिले की एक तहसोल । कालीनदी, गलाको । पढनेसे मालूम होता है, कि अशोक प्रतिष्ठित स्तम्मलिपि नहर और हिन्दन नदी इसको योनसे प्रवाहित होती है। दिलोके सम्राट फिरोजशाहफे द्वारा 'कुशाफे शिकार' दिल्ली सिन्धु और पक्षावका रेलपथ इसके पीचसे नामक महलमें लाई गई यो। जाता है। इससे व्यवसायको बड़ी सुविधा हो गई है। प्रततत्त्वफे नमूनास्वरूप यहां और भी प्राचीन यहां ऊनको ग्येती और चोनीका कारयार होता है। कोत्तियोंके कितने हो. खण्डहर देखे जाते हैं। इनमें . ३ इस जिलेका प्रधान नगर। यहां सदर अदालत | .१७१४ ई० में जवाहरलाल द्वारा स्थापित सीताकुण्ड मो एक है। यहां छावनी होनेको वजह इस स्थानको विशेष (कुछ लोग इसे सूप्यंकुण्ड भी कहते है। इसके उन्नति हुई है। गङ्गा यमुनाके ठीक बीच में मेरठ नगरी चारों ओर असंख्य मन्दिर, धर्मशालाये और सतीस्तम्भ . अवस्थित है। यह अखा० २६.४१“30 और देशा० स्थापित हैं। इन मन्दिरोंम सम्राट शाहजहां रामत्व .७७४५.३०पू०के मध्य विस्तृत है। कलफत्ते में जो कालका बनाया मनाहरशाहका मन्दिर सवसे यहा है। प्राएड रोड पश्चिमको ओर गयो है, यह भी इस नगर- - पिल्वेश्वरनाथका मन्दिर मुसलमानो आममणसे बहुत