पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७७३

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पीराबाई ६८७ राजकुमारीको देख सकेंगे।" मन्दर-राजकुमार बोले' को स्थान देतो हो। मेरा हृदय अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा "मृत्युसे मैं नहीं डरता, एक यार अपनी प्रणयिनीको देव है। तुम इसी क्षण मेरी आँखोसे दूर हो जा। न जानें कर ही मरूंगा।" पोछे ममताकी दुर्वलता या सौन्दर के मोहमें पड़ फिर परोपकार करने की इच्छासे मोराने झालयनका एक क्षमा कर तुम्हारी जैमी काली-नागिनीको घरमें आश्रय गुप्तद्वार खोल दिया। ज्यों ही मन्दर-राजकुमार राज- देना पड़े।" कुमारीके सोनेके कमरेके पास पहुचे त्यों ही झरोखेसे मीरा सिर झुपाये प्रसन्न मुबमे यहाँसे विदा हुई। राणा कुम्भने जोरसे गरज कर कहा, "मालवनमें प्रवेश याधी गतको हरिनाम संकीर्तन करते हुए मीराने राज. करके भो तुम राजकुमारीको नहीं देख सकते।" । भवनका परित्याग किया। यह संवाद पा चित्तौरवामी मन्दर राजकुमार मूच्छित हो धरती पर गिर पड़े। राणाकी मूर्खताको शिकारने लगे। मौरा चली गई, गुस्से में आ राणाने मीराको हो पथप्रदर्शक समझा और ! माथ साथ राजभवन में गोविन्द मन्दिरका मानन्दस्वाह इनके पास आ कर कहा, "मीरा ! मालयनफे गुप्तद्वार भाभी धन्द हो गया। को किसने खोला"मोराने माफ उत्तर दिया, "मैंने हो एक दिन जहां भक्तोंके. फलनिनाद और मृदङ्गवादमे गुमद्वार खोला है । यलसे कहों पया प्रेम प्राप्त हो सकता आनन्दकी वर्षा होती थी और राजनगरीको मजीयता है ? अन्य पुरुपके प्रेममें मासक्त रमणीको थाप चंद रख घोषित होती थी, उसके पकाएक बन्द होनेसे राजधानी निरानन्द-सी हो गई। कर क्या फल पायेंगे?" इस प्रकार निभीक और ___ मोरा चित्तीर छोड कर राजपूतानेके जिम प्रदेशमें अभिमानयुक्त उत्तर सुन चित्तौरके राणा स्तम्भित हो भ्रमण करतो वहीं उनके कलकटके म्यगीय संगीतमे योले, "मोरा! क्या तुम्हें मालूम है, कि अन्तःपुर द्वार मानन्द नदी उमड़ने लगती। सहस्र सहन स्त्री-पुरुष खोलनेसे कौनसा दण्ड मिलता है ?' . मोराने बिना किसी धवराहटके यहा, 'महागणा! अप- । उनके अनुपम सौन्दय्यका दर्शन कर और मङ्गोनसे मोहित हो उन्हें शापभ्रष्टा दुमरी देवांगना दो मानने 'राधके लिये क्षमा मांगती हैं। दण्डसे यह दामी नहीं लगे। डरतो । किन्तु सिमौदिया कुलके समुज्ज्वल यशों में राणा कुम्भको अपनी भूल मूम पडो। ये राजमयनके प्राण रहते कल-कालिमा न देख सकगी।" उदास और निरानन्दभावको न मद मके । अतएव उन्होंने राणाने आखें लाल पीली कर कहा, "मीरा! तुम कोलोरा लाने के लिये ब्राह्मण-दनोंको पत्रफे माथ घड़ी ढोट हो गई हो। तुम चित्तौरको राजमहिषो हो भेजा। अभिमान रहित वैष्णवो मोराने ब्राह्मणोंसे कहा, कर भी मुझ पर वेश्याको तरह आक्रमण करतो हो। मैं महाराणाको दामो', उनको अनुमति पा में फिर 'तुम्हारे ही सन्तोषके लिये मैंने अन्तःपुरमें गोविन्दजोका। उनके चरणप्रान्तमें जा सकती हैं।" मन्दिर बनवा दिया। लोकलाजको तिलाञ्जलि दे तुमने मीरा जय चित्तौरके तोरण द्वारा पर पहुंची तब जनसाधारणफे साय संकीर्तन करना चाहा-मैंने ' गणाने गाजेबाजेके साथ उनका स्वागत किया अन्तःपुर तुम्हारी यह बात भी मान ली। इसके बाद अधेरो ले जा कर राणाने मोरासे क्षमा मांगो। मीरा स्वामोके • रातमें मेरे मन मन्दर राजकुमारके साथ बाहर निकल चरणों पर गिर कर दोली, "मैं आपके चरणोंको दासी 'चित्तौर-महाराणाके भुजापाशमें वधी रमणीको है। मुझसे क्षमा मांग आप मेरा अपराध न यढ़ायें, . भगानेको चेटा कर, फहो तुमने कैसा विश्वासघात किया ! मेरे मभी अपराधोको माप क्षमा करें।" है ! भगवत् प्रेममें तुम रम गई हो, तो मन्दिरमें रह राणा कुम्मने कहा, "मीरा ! तुम भाजसे गोविन्दमौके संफोर्शन करो। युलाइनाको बहकानेही तुम्हें क्या मन्दिर में तथा चितौरको खुलो मही पर मौको साथ जरूरत ! अब मैं तुम्हें क्षमा न कर सकता । अमी ले नंकोर्शन कर सकनी हो। देग्य, इमसे भी चित्तको चित्तौर छोड़ चली जा । देवताके बहाने तुम पाप' शान्ति होती है या नहीं। ...