पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७९४

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७०२ मुक्तासन-मुक्ता मतवसन (सं०नि०) मुक्तं वसनं येन । १ जिसने । था, पर वे उसे पूरा कर न सके। पीछे पतियोला, वस्त्र पहनना छोड दिया हो, नंगा रहनेवाला ।२ जिसके } झिन्द और फरीदकोटके सरदारोंने उसे पूरा किया। शरीर पर कोई वस्त्र, न हो। (पु.) ३ जैन-यतियों या १७०५-०६ ई०में मुगलवाहिनीके साथ सिख-गुरु हर• संन्यासियोंका,एक भेद। . . . गोविन्दका भीषण युद्ध हुआ था, उसीके स्मरण में मेला मुक्तवास (सं० पु. ) शुक्ति, सोप। . . . . लगता है। ... . . . .. मुक्तधेणी (सं० स्त्री०) १ द्रौपदीका एक नाम,। द्रौपदीने महामेलेमें आये हुए दरिद्र यात्रियोंके रहनेके एक कौरवोंकी सभा लाञ्छित हो कर प्रतिज्ञा की थी, कि स्वतन्त्र मकान हैं। उन यात्रियोंको सरकारको ओरसे जब तक इस अपमानका यदला न लिया जायगा, तब भोजन भी मिलता है। मुक्तसरसे कोटकपुर तक रेल । तक चे मुफ्तकेशी हो रहेगो, अर्थात् जूड़ा न वांधेगी। लाईन दौड़ जानेसे इसको समृद्धि दिनों दिन. घढ़ती जा भोमने दुःशासनका रक्तपान और दुर्योधनका अरुदेश रही है। . .. ! भंड कर उस मुक्तयेणोको वांधा था। तभीसे द्रौपदी मुक्तसार (सपु०) कदलीवृक्ष, केलेका पेड़।। मुक्तवेणो नामसे प्रसिद्ध हैं। । मुक्तस्वामी (सं० पु०) काश्मीरराज द्वारा प्रतिष्ठित मोक्ष. २प्रयागका त्रिवेणी संगम। । . दातृ-श्वमूर्तिभेद् । (राजतर०४१८८). . . मुक्तध्यापार (सं० वि०) १ कार्य परित्यागकारी, जिसने मुक्तहस्त .( स० वि०) मुफ्तो हस्तो येन । जो खुले कारवार छोड़ दिया हो। २ संसारमें निर्लिप्त, जिसका । हाथों दान करता हो, यहुत बड़ा दानी । .... :.. संसारके कार्यों या व्यापारोंसे कोई सम्बन्ध न रह गया मक्ता (सं० स्रो० ) मोच्यते निःसार्यते इति वा । हो, संसार त्यागी। . . . . . . . मुच का, टाप । १ रास्ना, रासना। २ रत्नविशेष, . मुक्तक (सपु० ) रोहितक मत्स्य, रोह मछली। . मोती (Pearl) | पर्याय -मौकिक, सौम्या, शौक्ति- मुक्तसंशय ( स० त्रि.) मुक्तः संशयो येन । त्यक्त संशय, केय, तार भौतिक, भौतिक, अन्तःसार, शीतल, नीरज, जिसका संदेह दूर हो गया हो।. . नक्षल, इन्दुरत्न, लक्ष्मो, मुक्ताफल, यिन्दुफल, मुक्तिका, मुक्तसङ्ग ( स० वि० ) मुक्तः सङ्गो पेन. १ जो विषय- शोफ्तेयक, शुक्किमणि, स्वच्छहिम, हिमवल, सुधांशुभ, वासनासे रहित हो गया हो । (पु०) २ परिव्राजक। । सुधांशुरन, शौक्तिक, शुक्तिवीज, हारी, कुवल.। (जटाधर०) मुक्तसर--१ पञ्जाबके फिरोजपुर जिलान्तर्गत । एक तह- इसका गुण-सारफ, शीतल, फपाय, स्वादु, लेखन, सोल । यह अक्षा० ३०१ से ३०५४ उ० तथा देशा०। (चमन करानेवाला और धातुको पतला करनेवाला) ७४४ से ७४.५२ पू०के मध्य अवस्थित है। भूपरि नेत्रोका हितकर । इसको धारण करनेसे पाप और माण ६३५ वर्गमोल और जनसंख्या डेढ़ लाखसे ऊपर दरिद्रता दूर होती हैं । ( राजवल्लभ ) इसके अधिष्ठातो. है । इसके उत्तर-पश्चिममें सतलज नदो, पूर्वमे फरिद देवता चन्द्रमा हैं। । । कोट और दक्षिण-पूर्वमें पतियाला राज्य है। इसमे इसी भावप्रकाश में लिखा है- मामका एक शहर और ३२० ग्राम लगते हैं। "मौक्तिक शौक्तिकं मुक्ता तथा मुक्ताफलञ्च तत् ।। २ उक्त तहसोलका एक शहर । यह अक्षा० ३०.२८ । शुक्तिः शङ्खो गजकोड़ः फरणी मत्स्यश्च द१रः॥ . . उ० तथा देशा० ७४३१ पू०के मध्य अबस्थित है । जन वेणुरेते समाख्यातास्तज्ज्ञ मौक्तिकयोनपः। ., संख्या प्रायः ६३८६ है। फिरोजपुर जिलेमें यह शहर मौक्तिकं शीतनं वृष्यं चक्षुष्यंवलपुष्टिदम् ॥ (भाषप्रकाश ) सबसे बड़ा और वाणिज्य-व्यापारमें चढ़ा बढ़ा है। पूस. पर्याय-मौक्तिक, गौक्तिक, मुफ्ता एवं मुक्ताफल । के महीने में यहां सिखोंका तीन दिन तक मेला लगता | शुक्ति (मीप ), शंख, गजकोड़, सर्प, मत्स्य, भेक (मेढ़क) है। यहां एक बड़ा तालाब है जिसमें यात्री स्नान करते | और घेणु ये सब मुफ्तायोनि हैं अर्थात्, इन सबसे हैं। इस तालायको खोदवाना रणजित्ने भारम्भ पिया | मुफ्त की उत्पत्ति होती है। ,