पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/८५

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७६ पदम्मद अली खा- पहम्मद-इ-बरिश्तयार . . . मा तथा १० १८५५ में यूसुफ अली खाने रामपुरके ; नासिर उहीनके मरनेके बाद १८३१ ६०में अगरेज 'मंसनद पर पाया किया। राजने इन्हें लखनसको गहो पर विठाया। राजगहो पर • महम्मद अलोनाकर्नाटकके एक नवाब, अनवरदीन खां-। ठते ही उन्होंने अपना नाम 'अबुल फतें मोनुदीन फे पुत्र। पिताके मरने पर नयाव नासिरजत तथा सुल्तान जमान महम्मद अली शाह रखा । १८४२ ६०में - अंग्रेजोको सहायतासे १७५० ई० में ये राजमिहासन पर पांच वर्ष राज्य करने के बाद लखनऊ नगरमें इनकी मृत्यु वैठे। १७९५ ई० में इनका देहान्त हुआ। हुई। बाद में इनका लंहका सूर्य जा आमजाद अली शाह महम्मद अली दिन हम्मीद-'तारीख इ हिन्द व-सिन्ध' वा गद्दी पर बैठा। .. . .. 'चाच नामा' नामक इतिहासके लेखक। महम्मद अब्दुल ‘घाको-'मा सौर-इ-रहीमो' नामक महम्मद अली खां-टॉकका एक नवाव, पिएडारो-सरदार, इतिहासके प्रणेना।... : --". ".:. समोर सांका पुत्र । पिताके मरने पर १८३४ ई०मे पह, महम्मद अयुल कासिमपांगद दिके प्रसिद्ध भौगोलिक गहो पर वैटा। परन्तु लावाके हत्याकाण्डमें भाग इन्होंने १४३ में अपनी जन्मभूमिका त्याग कर मफ्रिका लेनेसे अप्रेज सरकारने इसे गद्दोसे उतार दिया।। परसिया तथा पश्चिम भारतमें भ्रमण कर एक प्रग्य .१८७० ई० में इसका पुन इमाहिम अलोखां वृटिश सरकार लिखा था। " के राजनैतिक विभागसे नवाव बनाया गया। महम्मद इस्लाग--'फह तुन नांजिरीन नाम इतिहासके महम्मद अली मोर-मीरट-उस-सफा नामक प्रध-प्रणेता प्रणेता. महम्मद फिजल भन्सारीका लडका "सने इनका वासस्थान ध्रुहानपुरमें था। १७७० ६०में अपनी पुस्तक समाप्त की महम्मद अली मिरजा-आरके एक मुसलमान कवि । इन महम्म-:-वतियार-बङ्गालंफे सांप्रथम मुसलमान शासक को काध्य रचनाशक्तिमे इन्हें माहिर' को उपाधि मिली। इनको असल नाम था 'मालिक उल गांजो इस्तियायहीन थी। इनके पिता हिन्दू थें । मिर्जा जाफर मुसम्माई नामक | महम्मद इस्तियार ।' ये खिलिजी जातिके थे। इति. एक गांडके यहां इनके पिता नौकरी करते थे। भांडके हासकारों ने इन्हें इनके पिता (महम्मद यस्त्रियार खिलजी) एक भी सन्तान न थी, इस कारण उसने अपने इसी के नामर्स परिचित कर यई भ्रममें डाल दिया है। ये हिन्दू करके पुतकोमुसलमानो धर्ममें दीक्षित कर मान विद्या, बुद्धि, सहिष्णुता, साहस, वीर्य तथा उदारता सारी सम्पत्तिका उत्तराधिकारी यनाया । इस धर्मत्यागी। वादि सदगुणोंमे विभूपित थे। बालक महम्मदने जाफरको संरक्षनामें उस शिक्षा प्राप्त जन्मभूमिका त्याग कर ये गजनी गजाफे दरवारमें फो। मिर्जा जाफरफी मृत्युके याद महम्मद दनेशानन्द | नौकरोफे लिये आये। पर यहाँ उपयुक येतन न मिलने । बाँके आधयों रहने लगे। धनेशानन्दफे मरने पर कम-1 से हिन्दुस्तानको चल दिये। दिल्ली-राजदरवारमें मां अब जीयनसे अवसर पा कर ये निर्जन स्थानमें अपना समय इनको इच्छा पूरी न हुई तब ये बदौन चले गये। वहां । विताने लगे। इसी समय १६७८ ई०मैं इनको मृत्यु शासक सिपाहसलार हिजाबमहीन हनन इ-श्रादि ... ...। दरयारमै उपयुक्त वेतन पर नौकरी करने लगी.... 1 -ये उच्च श्रेणीफे एक कवि थे। इनके बनाये अनेक इन नचा महम्मदन मामान

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काय अधोंमें 'गुन्न इ मोरङ्ग काय विशेष प्रशंसनीय है।। युद्धमें अन्धो भयोति पाई र इस कायमें इन्होंने सम्राट औरङ्गजेवका राज्याभिषेक वडी उन्ह, उमएटी जागीर पाकार हो सुन्दरतासे वर्णन किया है। र करस सम्पति महम्मद मली शाह- अयोध्या के एक नवाब । ग्रेनषा

ही हुए।.. मासिपहीला नामसे प्रसिद्ध थे। इनके पिताको कुछ दिद .: . "नाम था. नयाद सयादत मिली .. . . २