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जर्मनी
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अकेली संस्था है जो सरकार द्वारा स्वीकृत तथा क़ानूनी है। नात्सी दल का संगठन भी सरकार की तरह है। एक प्रकार से यह दल भी स्थानान्तर सरकार ही है। नात्सी विचारधारा के विरुद्ध कोई बात कहना अपराध है। जर्मनी मे कोई भी नागरिक-स्वाधीनता नागरिको को प्राप्त नहीं है। न अपने विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता है, न भाषण करने या सभा में जाने की। व्यक्तिगत स्वाधीनता तो और भी ख़तरे में है। आतकवाद के कारण नागरिको को हर समय भय का शिकार बने रहना पड़ता है। यहूदियों के ख़िलाफ क़ानून प्रचलित हैं। ईसाई-धर्म (चर्च) की वर्तमान संस्था के अधीन और उसके अन्धानुयायी नात्सी नहीं रहना चाहते। प्रोटेस्टेन्टवाद को वह अपने राष्ट्रीय-समाजवादी संगठन के अधीन रखना चाहते है। इसी कारण उन्हे गिरजाघरो के प्रति श्रद्धा नहीं है। मज़दूर सघो की मनाई है तथा सब मज़दूरो को 'नात्सी मज़दूर मोर्चे' में शामिल होना ज़रूरी है।

सामान्यतया एक-चौथाई औद्योगिक पैदावार जर्मनी बाहर दूसरे देशो को भेजता था। सन् १९२९ में १३ अरब मार्क (जर्मन सिक्का) का माल विदेशो को गया। सन् १९३३ में केवल ४ अरब मार्क का माल बाहर गया और सन् १९३८ में ५ अरब २ करोड़ मार्क का माल जर्मनी ने विदेशो को भेजा तथा ५ अरब ५ करोड़ मार्क का माल विदेशो से मॅगाया। जर्मनी सिर्फ कच्चा माल तथा खाद्य पदार्थ बाहर-से मॅगाता था। कई साल से जर्मनी में अन्न और कच्चे माल का टोटा रहा है। कोयला जर्मनी मे पर्याप्त है। कुछ लोहा उसे बाहर से मॅगाना पड़ता है। युद्ध छेड़ देने से जर्मनी के वैदेशिक-व्यापार में लगभग ७० फीसदी की कमी होगई है। जर्मनी का राष्ट्रीय ऋण सन् १९३३ में १२ अरब मार्क और युद्ध शुरू होने के पहले ६० अरब मार्क था। जर्मनी में कच्चे माल का अभाव है। केवल कोयला ही वहाँ पैदा होता है। अन्न भी कम पैदा होता है। नात्सी-जर्मनी का उद्देश, यूरोपियन लेखको के अनुसार, साम्राज्यवाद और यूरोप तथा संसार पर आधिपत्य स्थापित करना प्रतीत होता है। विगत विश्वयुद्ध की पराजय से जर्मन-जाति की मनोवस्था पर बहुत प्रतिक्रिया हुई है। उनका कहना है कि पिछले महायुद्ध में केवल समाजवादी क्रियाकलाप और नेतृत्व