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नार्वे
 


दिवस ही अधिकृत कर चुकी थी। ७ जून १९४० को मित्र-सेनाएँ नार्वे के रणक्षेत्र से हटाली गई। राजा हाकोन और उसका प्रधान मत्री ब्रिटेन को भाग गये। कुछ नार्वेजियन सेनाएँ भी, अन्य क्षेत्रों पर लडने के लिये, साथ लेजाई गई, शेष सेना ने हथियार डाल दिये। कामन्स-सभा मे, नार्वे के युद्ध के सम्बन्ध मे, ब्रिटिश पार्लमेट के विरोधी दल के नेता मेजर एटली, सर आर्चीवाल्ड सिंक्लेयर, मि० आर्थर ग्रीनवुड और सर रोमेर ने बड़े कड़े शब्दों में आलोचना की। तत्कालीन प्रधान-मत्री चेम्बरलेन ने भाषण में यह स्वीकार किया कि “मै यह भलीभॉति जानता हूँ कि इन घटनाओं के परिणाम पर केवल इस दृष्टि से विचार नही करना हैं कि नार्वे में क्या हानि हुई है; हमे तो इस बात पर विचार करना है कि इससे हमारे गौरव का कितना नाश हुआ है। इससे इस मिथ्या कहानी को भी कुछ रग मिल गया है कि जर्मन सेना अजेय है। हमारे कुछ मित्रों का उत्साह भी भग हुआ है और हमारे शत्रु चीख-पुकार कर रहे हैं।" इस पराजय से मित्र-राष्ट्रो को भयकर आर्थिक हानि उठानी पडी। नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क तथा बाल्टिक राज्यों से ब्रिटेन को रसद मिलना बन्द हो

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गया और बाल्टिक सागर से ब्रिटेन का प्रभुत्व उठ गया। प्रति वर्ष ५,७०,००० टन लोहा ब्रिटेन नार्वे से मॅगाता था। इस विजय से उस समय जर्मनी की स्थिति मज़बूत हुई और नार्वे की लकड़ी, जहाजों तथा लोहे पर भी उसने अपना अधिकार जमा लिया।

नार्वे में जर्मन-आधिपत्य का विरोध बराबर जारी है। वहाँ उन्होंने क्किसलिग के सगी-साथियों के सहयोग से नात्सी राइख (पार्लमेन्ट) दी है, किन्तु जनता उसके