पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२१३

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२०७ बलकान राष्ट्र-समूह युद्ध और, अन्ततोगत्वा, पिछले महायुद्ध के कारण भी इनको विशेषता प्राप्त है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति मे बलकान-राष्ट्र-समूह बराबर एक ख़तरे का स्थान रहा है । बलकान राज्यो और पूर्वकालीन रूसी तथा जर्मन-श्रास्ट्रियन- साम्राज्यो मे काफी संघर्ष रहा है । उत्तर मे आस्ट्रिया-हंगेरी-साम्राज्य के छिन्न-भिन्न होजाने से उनकी महत्ता बढ़ गई, परन्तु जबसे आस्ट्रिया तथा चैकोस्लोवाकिया का हिटलर ने अपहरण किया, तब से इनके लिये खतरा पैदा होगया । बलकान राज्यो का महत्त्व उनकी कृषि, खनिज-उद्योगो तथा युद्धोपयोगी मोर्चे की विशेषता के कारण है । वे एशिया के स्थल-मार्ग पर स्थित हैं और उनमे होकर पूर्वीय भूमध्य-सागर पर आधिपत्य रखा जा सकता है । जर्मनी इन राज्यो पर—पहले अपने मित्र प्रास्ट्रिया द्वारा और अब स्वय-नियत्रण करने के लिये सदैव लालायित रहा है । वह अपनी महत्त्वाकांक्षापूर्ण बर्लिन-बग़दाद-लाइन की योजना द्वारा मोसल के तेल के कुत्रो तक और आगे भारत तक जाने के सुखस्वप्न देख चुका है । सन् १६१४ तक रूस जर्मनी की इस आकांक्षा-पूर्ति मे वाधक रहा । सन् १९१८ से '३६ तक बलकान राज्यो मे रूस का कोई प्रभाव नही रहा । परन्तु १६३६-४० मे, पश्चिम की ओर बढने से, रूस का फिर बल- कान मे प्रभाव बढने लगा है। वर्तमान विश्वयुद्ध के प्रारम्भिक काल मे जर्मन, अतालवी, रूसी और बरतानवी प्रभाव बलकान-राष्ट्रो मे आपस मे टकराते रहे। बलकान के आधे वैदेशिक व्यापार पर जर्मनी ने, इस युद्ध से पूर्व ही, नियत्रण प्राप्त कर लिया था और राजनीतिक प्रभाव भी | रूसी प्रभाव का अाधार था बलग़ारिया और यूगोस्लाविया मे 'पानस्लाववाद' की पुनरावृत्ति । किन्तु जर्मनी ने अक्टूबर '४० मे रूमानिया और '४१ मे बलगारिया पर, विना किसी विरोध के, कब्ज़ा कर लिया। इटली ने अक्टूबर '४० मे यूनान पर हमला कर दिया । अप्रैल '४१ मे जर्मनी ने यूगोस्लाविया और यूनान दोनों पर हमला करके, कुछ दिनो के युद्ध के बाद, उन पर कब्जा कर लिया । रूस-जर्मन-संबंध, इस कारण, पहली बार बिगडे और अन्त मे जून '४१ मे रूस पर जर्मनी ने हमला ही कर दिया । पिछले बीस सालों मे इन राष्ट्रों का उद्योगीकरण हुया है, फिर भी ८० फीसदी जनता खेती और पशुपालन पर आश्रित है | जनता