पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२३५

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भारत २२६ बहुत क्षुब्ध थे । फलतः गांधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन और ख़िलाफत आन्दोलन साथ-साथ चले । कांग्रेस की कायापलट हुई, माडरेटो के हाथ से वह, देशोद्धार के लिए चिन्तित और राष्ट्रोन्नति के लिये उद्यत, राष्ट्रवादियो के हाथ में आई और, महात्मा गांधी के नेतृत्व मे, कांग्रेस ने स्वराज्य-प्राप्ति के लिये आन्दोलन शुरू किया । अान्दोलन ठडा भी न होपाया था कि देश मे हिन्दू-मुसलिम-विग्रह की बाढ़-सी गई । यह आश्चर्य की बात है कि राजनीतिक आन्दोलनो के बाद ही यह दगे अधिकतर हुए । किन्तु राष्ट्रीय आन्दोलन, किसी-न-किसी रूप में, बराबर जारी रहा । हिन्सात्मक आन्दोलन ने भी इस बीच ज़ोर पकडा ।। १६२८ मे ब्रिटिश सरकार ने एक शाही कमीशन, सर जान साइमन के नेतृत्व मे, भारतीय समस्या की जॉच के उद्देश्य से, यहाँ भेजा । काग्रेस ने इस कमीशन का देशव्यापी बहिष्कार किया और इसकी सिफ़ारशी रिपोर्ट को ठुकरा दिया । यद्यपि इस कमीशन का लक्ष्य भारतीय शासन-सुधारो के सबंध मे जॉच और सिफ़ारशे करना था, किन्तु इसमे एक भी भारतीय सदस्य नियुक्त नहीं किया गया : सातो सदस्य विलायत से भेजे गये । कांग्रेस ने अपनी राष्ट्रीय मॉग को उपस्थित करने के लिये पं० मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक कमिटी नियुक्त की । इस कमिटी की रिपोर्ट की सिफ़ारशे ‘राष्ट्रीय सॉग' के नाम से मशहूर हैं । इस नेहरू रिपोर्ट में भारत का तत्कालीन लक्ष्य औपनिवेशिक शासन-पद स्वीकार कर लिया गया था । पुराने नेता महात्मा गांधी, प० मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपतराय, आदि औपनिवेशिक स्वराज्य से सन्तुष्ट थे । एक दूसरा दल प० जवाहरलाल नेहरू तथा बाबू सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व मे पूर्ण स्वाधीनता के पक्ष मे था । वह ब्रिटेन से सम्बन्ध-विच्छेद चाहता था। नेहरू-रिपोर्ट की सरकार द्वारा स्वीकृति के लिये अन्तिम तिथि ३१ दिसम्बर १९२६ रखी गई। सरकार ने रिपोर्ट को | स्वीकार नही किया । अतः कांग्रेस ने अपने लाहौर-अधिवेशन मे उसी वर्ष पूर्ण स्वाधीनता को अपना लक्ष्य घोषित कर दिया । । सन् १९३० मे सविनय-अवज्ञा अथवा नमक-सत्याग्रह-आन्दोलन गांधीजी | ने छेडा, जो बडी तीव्र गति से चला । हज़ारो देशवासी स्त्री, पुरुष, बालक