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भारत
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बहुत क्षुब्ध थे। फलतः गांधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन और ख़िलाफत आन्दोलन साथ-साथ चले। कांग्रेस की कायापलट हुई, माडरेटों के हाथ से वह, देशोद्धार के लिए चिन्तित और राष्ट्रोन्नति के लिये उद्यत, राष्ट्रवादियों के हाथ में आई और, महात्मा गांधी के नेतृत्व में, कांग्रेस ने स्वराज्य-प्राप्ति के लिये आन्दोलन शुरू किया। आन्दोलन ठंडा भी न हो पाया था कि देश में हिन्दू-मुसलिम-विग्रह की बाढ़-सी आ गई। यह आश्चर्य की बात है कि राजनीतिक आन्दोलनों के बाद ही यह दंगे अधिकतर हुए। किन्तु राष्ट्रीय आन्दोलन, किसी-न-किसी रूप में, बराबर जारी रहा। हिन्सात्मक आन्दोलन ने भी इस बीच ज़ोर पकड़ा।

१९२८ में ब्रिटिश सरकार ने एक शाही कमीशन, सर जान साइमन के नेतृत्व में, भारतीय समस्या की जाँच के उद्देश्य से, यहाँ भेजा। कांग्रेस ने इस कमीशन का देशव्यापी बहिष्कार किया और इसकी सिफ़ारशी रिपोर्ट को ठुकरा दिया। यद्यपि इस कमीशन का लक्ष्य भारतीय शासन-सुधारों के सबंध मे जाँच और सिफ़ारशें करना था, किन्तु इसमें एक भी भारतीय सदस्य नियुक्त नहीं किया गया : सातों सदस्य विलायत से भेजे गये। कांग्रेस ने अपनी राष्ट्रीय माँग को उपस्थित करने के लिये पं॰ मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक कमिटी नियुक्त की। इस कमिटी की रिपोर्ट की सिफ़ारशें 'राष्ट्रीय माँग' के नाम से मशहूर हैं। इस नेहरू रिपोर्ट में भारत का तत्कालीन लक्ष्य औपनिवेशिक शासन-पद स्वीकार कर लिया गया था। पुराने नेता महात्मा गांधी, पं॰ मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपतराय, आदि औपनिवेशिक स्वराज्य से सन्तुष्ट थे। एक दूसरा दल पं॰ जवाहरलाल नेहरू तथा बाबू सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में पूर्ण स्वाधीनता के पक्ष में था। वह ब्रिटेन से सम्बन्ध-विच्छेद चाहता था। नेहरू-रिपोर्ट की सरकार द्वारा स्वीकृति के लिये अन्तिम तिथि ३१ दिसम्बर १९२९ रखी गई। सरकार ने रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया। अतः कांग्रेस ने अपने लाहौर-अधिवेशन में उसी वर्ष पूर्ण स्वाधीनता को अपना लक्ष्य घोषित कर दिया।

सन् १९३० में सविनय-अवज्ञा अथवा नमक-सत्याग्रह-आन्दोलन गांधीजी ने छेड़ा, जो बड़ी तीव्र गति से चला। हज़ारो देशवासी स्त्री, पुरुष, बालक