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भारत
 

७ दिसम्बर को जापान ने प्रशान्त महासागर में हमला कर दिया और सुदूरपूर्व में युद्ध छिड़ गया। ३१ दिसम्बर की बारदोली की कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक में सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया। महात्मा गांधी भी इसी बैठक में देश के नेतृत्व-भार से मुक्त कर दिये गये।

फरवरी '४२ में मार्शल च्याग् काई-शेक भारत आये और उन्होंने अपनी विदाई के वक्तव्य में प्रबल आशापूर्ण अपील की कि ब्रिटिश सरकार भारत को स्वतन्त्र घोषित कर देगी।

मार्च '४२ में सर स्टेफर्ड क्रिप्स अपने प्रस्ताव लेकर भारत आये। इस प्रयास का भी, क्रिप्स-योजना में वास्तविक अधिकार न मिलने के अभाव के कारण, कोई सुफल नहीं निकला।

१ मई १९४२ को प्रयाग के अ॰-भा॰ कांग्रेस कमिटी के अधिवेशन में राजनीतिक स्थिति पर एक प्रस्ताव स्वीकार किया गया। इस प्रस्ताव में क्रिप्स-योजना की आलोचना तथा भारत के युद्ध में सहयोग देने के संबंध में, अपना मत प्रकाशित करने के बाद स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की कि––कमिटी इससे इनकार करती है कि भारत को किसी बाहरी राष्ट्र के हस्तक्षेप अथवा उसके द्वारा आक्रमण से स्वाधीनता मिल जायगी। यदि भारत पर आक्रमण हुआ तो उसका प्रतिरोध किया जायगा। यह प्रतिरोध केवल अहिंसात्मक असहयोग का ही रूप धारण कर सकता है। इसी बैठक में श्री जगतनारायण लाल का प्रस्ताव भी कमिटी ने स्वीकार किया जिसके अनुसार कांग्रेस भारत की अखण्डता के लिये प्रतिज्ञाबद्ध है। इस बैठक में श्री राजगोपालाचारी ने इस आशय का एक प्रस्ताव पेश किया कि कांग्रेस को मुसलिम लीग की पाकिस्तान की माँग को स्वीकार कर लेना चाहिए, किन्तु यह स्वीकृत न होसका। इसके बाद राजाजी ने कांग्रेस कार्य-समिति, मदरास प्रान्तीय कांग्रेस समिति तथा अ॰-भा॰ कांग्रेस समिति की सदस्यता से त्यागपत्र देदिया।

इसके बाद १४ जुलाई १९४२ को वर्धा में कांग्रेस कार्यकारिणी कमिटी का अधिवेशन हुआ। क्रिप्स-योजना की विफलता के बाद से ही गांधीजी ने 'हरिजन' में 'भारत छोड़ो' (Quit India) आन्दोलन की चर्चा शुरू करदी