पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२४३

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भारत २३७ थी । इस अधिवेशन में भारत छोड़ो' प्रस्ताव स्वीकार किया गया। इस प्रस्ताव में काग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से यह अपील की कि वह भारत से अपनी शासनसत्ता को हटाते । इसका यह तात्पर्य नहीं कि भारत से अगरेज मात्र वापस चले जाये । और न इसका यह मतलब है कि भारत में जो गोरी सेनाएँ हैं, वे वापस अपने देश को चली जाये, प्रत्युत इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि भारत को स्वाधीन राष्ट्र घोषित कर दिया जाय और भारत में भारतीय जनता का प्रतिनिधि शासन स्थापित हो । इस प्रस्ताव मे यह भी कहा गया कि यदि सरकार ने इस अपील पर ध्यान नही दिया, तो काग्रेस अपने राजनीतिक स्वत्वों तथा स्वतत्रता की प्राप्ति के लिए, सन् १९२० से अब तक संचित अहिंसा-शक्ति का उपयोग करेगी । यह व्यापक संघर्ष महात्मा गांधी के नेतृत्व मे होगा । इस प्रस्ताव की अन्तिम स्वीकृति के लिए ७ अगस्त १९४२ को अ०भा० काग्रेस कमिटी का अधिवेशन बुलाने के लिए भी आदेश किया गया। उपर्युक्त निश्चयानुसार, ७ अगस्त १९४२ को, बंबई मे कमिटी का अधिवेशन, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के सभापतित्व में, हुआ । ८ अगस्त की बैठक में यह प्रस्ताव, संशोधित तथा कार्य-समिति द्वारा परिवद्धित रूप मे, काग्रेस कमिटी द्वारा स्वीकार किया गया । | इस अधिवेशन की समाप्ति पर गांधीजी वाइसराय को पत्र लिखनेवाले थे और वह चाहते थे कि वाइसराय से मिलकर वर्तमान संकट के अन्त करने के उपाय सोचे जाये । इसी प्रकार वह अमरीकी राष्ट्रपति रूज़वैल्ट, सोवियत रूस के ब्रिटेन-स्थित राजदूत, तथा जनरलिस्सिमो च्यांग् काई-शेक को पत्र भेजनेवाले थे, जिससे कि संयुक्त-राष्ट्रों को भी भारतीय वस्तु स्थिति का ज्ञान होजाय । परन्तु ता० ६ अगस्त १९४२ के प्रातःकाल ही महात्मा गांधी तथा अन्य सभी प्रमुख कांग्रेस-नेताओं को बंबई में गिरफ्तार कर लिया गया । उसी दिन से भारत के समस्त प्रान्तों में नगरों, क़स्बो एवं ग्रामों में काम कार्यकर्ताओं और नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया गया । काग्रेस कमिटियों तथा खादी भंडारों तक को गैर-कानूनी संस्थाएँ घोषित कर दया गया । देश भर में दमन का दावालन बडे भयंकर रूप में प्रज्वलित न लगा । उसकी लपटों से कोई भी देशभक्त अछूता न बच सका।