शीघ्र ही अरुचि होगई और प्रान्तीय सहयोग-विभाग मे इन्सपेक्टर होगये। १९१७ मे महात्मा गांधी की निगाहो में चढ़ गये। वह उन्हे साबरमती आश्रम ले आये। महादेव देसाई महात्मा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी बने। १९१९ में 'यंग इंडिया' और गुजराती 'नवजीवन' के सम्पादन मे महात्माजी के सहकारी बने, जबकि गांधीजी ने 'यंगइंडिया' को श्री जमुनादास द्वारकादास से ले लिया था। १९२० में महात्माजी ने प्रयाग के 'इन्डिपेन्डेन्ट' का सम्पादन करने के लिये देसाईजी को भेजा। १९३१ में, गांधीजी के सेक्रेटरी की हैसियत से, राउन्ड टेबल कान्फरेन्स के अवसर पर, विलायत गये। सन् १९३३ के गांधीजी के आमरण-व्रत के समय, यरवदा जेल में, उनके साथ बन्दी थे। गांधीजी की नीति को हृदयंगम कर लेने के कारण ही उन्होने महादेव देसाई को 'हरिजन' का सम्पादक बना दिया था, और इस पत्र मे तथा अन्यत्र वह 'एम० डी०' नाम से ख़ूब लिखा करते थे। गुजराती और अंग्रेज़ी शैली पर उनका समान रूप से अधिकार था। गांधीजी जैसे विश्व-विख्यात महापुरुष के दैनिक पत्र-व्यवहार को वही संभाल पाते थे। गांधीजी के निकट सामीप्य मे रहने का उन्हे अद्वितीय, अलभ्य अवसर प्राप्त हुआ। महादेव भाई की मृत्यु मे अपने युग का तुलसीदास चला गया और राष्ट्र की इस साहित्यिक क्षति की पूर्ति अब असम्भव है।
'भारत छोड़ो' प्रस्ताव के बाद ९ अगस्त १९४२ को महादेव भाई भी, गांधीजी आदि नेताओ सहित, पकड़े गये और बम्बई सरकार की विज्ञप्ति से पता चला कि, ६ दिन बाद, १५ अगस्त '४२ के प्रातःकाल, नज़रबन्दी के अज्ञात स्थान में, हृदयगति रुक जाने से, उनका देहान्त होगया। वहीं उनका दाह हुआ।
महादेव भाई ने पच्चीस वर्षों तक, गांधीजी के सहायक और उनके परम विश्वासपात्र रहकर राष्ट्र की बहुमूल्य सेवा की। उनका जीवन देश की स्वाधीनता के लिये लड़नेवाले एक सैनिक की भाँति आरम्भ हुआ और उसी की भाँति समाप्त भी। अपने देश और देवता पर वह बलिदान होगये।
महेन्द्रप्रतापसिंह, राजा--भारत के निर्वासित देशभक्त। जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल ५, सम्वत् १९४३ वि०। पिता का नाम राजा घनश्यामसिंह। जन्म स्थान मुरसान (ज़िला अलीगढ़)। राजा हरनारायण सिंह के दत्तक