पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/१०८

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॥२॥ चोपई बिस्न बान लाग्या अति भारी। दिष्टि न श्रावे प्रेम पियारी ॥ गिरे परे बेठे बिकरार। निस दिन उठे बिस्ल की भारा॥ कबहूं कले बात तुतलाई। कबहूँ चित व्याकुल है जाई॥ . बेद देषि कछु मरम न पावे। कृष्ण देव सो पानि सुनावे ॥ श्रौषधि मंत्र न येको लागे। फुरे न येके सो गुन जागे ॥ योला। बिस्न बान जिलिं लागई सो जाने यह भेव । कुंवर बिधा निखारिया सो देवन का देव ॥ चोपई। कुवर बात तुम छाडो मीता। अब तुम कहो कुंवर टुष चिंता॥ उषा बिकल परी मुरझाई। चित्ररेष तब पहुंची श्राई॥ निरषी कुवरि धरनि मे परी। चितवे इत उत बिरल की जरी ॥ बस्न हिरकि तब कुंवरि जगाई। बोली भरम उठी अंगराई। काले उषा भई यानी। छाडि कुंवरि तू प्रेम कहानी॥ दोला। तू बाला सन सुंदरी रस की छाडी चिंत। प्रेम कहानी जो कथे सो के जोबनमंत ॥ चौपई। मेरी सिष सुनि राज दुलारी। मात पिता की प्रेम पियारी ॥ बिरल रीति कित जाने बोरी। निज पग धरो प्रेम की पोरी॥ प्रेम पंथ ले षरा टुषारा। सीस जात नहिं लागत बारा ॥