पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/१२९

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॥१३॥ दोर्दण्ड परधरि गिरि सकानन फिरत जो बलवान ।। चतुर्विधि को गदा युद्ध समेत शस्त्र अनेक। भयो ता को परम बेत्ता बीर भूपति एक॥ दूरस्थ अरिप गदा केरो छोडिवो प्रक्षेप। अरु समीपस्थ निकोटि.कस्कि स्लन सो बिक्षेप ।। बळु अनि माहि घुमायक चहुं दिशि गदा हि सक्रोध । जो लन ता को परिक्षेप सु कस्त परम सबोध ॥ अरु लन जोन गदाय सों हे हाकि ठूल चलाय। विधि अभिक्षेप सु कल्त ता को बुधन के समुदाय ।। गज स्य रोक्न मे चतुर अति बिष्णु सम बलवान। भयो भूप दुखत तेजस भरो भानु समान । अक्षोभ्य सिन्धु समान भोसु सहिष्णु धरणी रूप। जनमेजय उवाच। सु शकुन्तला अरु भस्त संभव कल्लु सु मुनि अनूप । सुशकुन्तला को लही जिमि टुपन्त भूप महान। सुनो चालत तोन तुम सौ कल्लु सु मुनि सुजान । बेसंपायन उवाच। साजिके चतुरङ्ग सेना भूप सो बर बीर। चलो मृगया हेतु बन को एक दिन रण धीर। नाग वृहित स्यन्दन सु मुनि अव क्रेषित घोर। सुभट नादन सो भरो नम भूमि चारो ओर। चाहि प्रासादन लखें पुर तिय भूप शक्र समान ।