पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/२४

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॥८॥ पायो हे पे पुत्र को सुख नाहीं देख्यो। कस्तु हैं कि जिननि बडे तीर्थनि में अति कठिन तप ब्रत किये हैं तिन के सुत प्राज्ञाकारी धनवान पंडित धर्मात्मा होतु हैं। ये छल बस्तु संसार में सुखदायक हैं सदा धन की प्राप्ति शरीर आरोग्य स्त्री तें हित नारी मिठबोली पुत्र । प्राप्ताकारी अरु विद्या तें लाभ। इतनी कहि पनि राजा बोल्यो कि मेरे पुत्र गुनवान लोय तो भली। यह सुनि कोऊ राजसभा में ते बोल्यो कि महाराज । श्रायु कर्म वित्त बिद्या अरु मरन ये पांच बात देहधारी को गर्भ ही में सिरजी हैं तातें जो भावी में है सो बिना भये नाहीं रहति जैसें श्री महादेव जू को नग्रता अरु श्री भगवान को सर्प सय्या। ता सों चिंता मति करो जो तिहारे पुत्रनि के कर्म में बिया लिखी है तो विद्यावान होयगे। पुनि राजा कही यह तो सांच है पर मनुष को परमेश्वर में हाथ अरु शान दयो है सो विद्या साधन के अर्थ । जैसें एक चक्र को रथ न चले-तैसें बिन पुरुषार्थ किये काज सिद्ध न लोय तातें उयम सदा करिये कर्म कोई त्रासरी करिन बेठि रहिये । कयो है कि जैसें कुम्हार माटी ल्याय जो कछु कसो चाहे सो करे तैसें नर तू अपने कर्म समान फल पावे। कर्म तो जड़ है वा सों कछू न होय उद्यम करता है ता सों करता कर्म को प्रेरे तब भलो बुरे करता के कर्म संयोग तें होय। अरु केवल कर्म कोई प्रासरे करि बेठि रहनो कपूत को काम है। अरु जा के माता पिता सुत कों विद्या को उद्यम न करावे ते शत्रु जानिये। कन्यो है कि मूढ़ पुत्र पंडितनि की सभा में शोभा न पावे जैसें . लंसनि में बगुला न सोहे।