पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/९३

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॥७७॥ ले रो बहिनि दही को मोला। राख्यो राम हमारो बोला ॥ उरपी गूजरि छुरे न हाथा। नहीं सो लेइ डोलावे माथा ॥ दधि को मोल देलु जो पावे। राजा दंड लेइ सुनि पावे॥ इतनो मोहि खान नहि देले। सूरज सेन चोगुनी लेहे ॥ तब स्वामी बोले सति भाङ। तोहि न राजा रे काङ॥ तेरे काज तहां लम जैहैं। हरि साधुन के उपर देलें ॥ यह बातें सुनि लषी नारी। बलुत बार कीन्ही मनुहारी ॥ इन्त को बेगि मुझे कीजे। और कडू हम हूं सों लीजे॥ पीपा कहे मोल ले माई। तेरे भाग भेंट यह आई ॥ मेरे बचन झूठ जनि पारे। सत छोडे परमेश्वर मारे॥ तब गूजरी मन कियो बिचार। दीक्षा लई न लागी बारा॥ अपना करि सब पूजा कीन्हा । और सोंज भक्तन्त को दीन्हा । ऐसी प्रीति भक्ति सो लागी। निसि दिन स्रुति हृदय अनुएगी। तब ते पीपा के मन भावे। निति उठि गोरस ले पहुंचावे॥ ब्रायन को भक्त कियो देबी दे निकारिक। ब्राहमान एक नगर मंह ऐसो। गर्बवंत अति कलिये जेसो॥ धन जोबन परिवार संजूता। सकल सौंज देखिए बतूता ॥ तिन देवी को चक्र करायो। बिप्र सहित सब के मन भायो॥ करी बिबिधि बिधि श्रद्धा भारी। बलुत लोग न्योते नर नारी ॥ सो पीपा को न्योतन आयो। मान्यो नहीं बलुत समुझायो। पीपा कयो कहा करु मेरा। तो हो न्योता मानों तेरा ॥