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मशीनें

संपादक : फिर भी उसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। हिन्दुस्तान कभी नास्तिक नहीं बनेगा। हिन्दुस्तानकी भूमिमें नास्तिक फल-फूल नहीं पकते। बेशक, यह काम मुश्किल है। धर्मकी शिक्षाका ख़याल करते ही सिर चकराने लगता है। धर्मके आचार्य दंभी और स्वार्थी[१] मालूम होते हैं। उनके पास पहुँचकर हमें नम्र भावसे उन्हें समझाना होगा। उसकी कुंजी मुल्लों, दस्तूरों और ब्राहाणोके हाथमें है। लेकिन उनमें अगर सद्बुद्धि पैदा न हो, तो अंग्रेजी शिक्षाके कारण हममें जो जोश पैदा हुआ है उसका उपयोग करके हम लोगोंको नीतिकी शिक्षा दे सकते हैं। यह कोई बहुत मुश्किल बात नहीं है। हिन्दुस्तानी सागरके किनारे पर ही मैल जमा है। उस मैलसे जो गंदे हो गये हैं उन्हें साफ होना है। हम लोग ऐसे ही हैं और खुद ही बहुत कुछ साफ हो सकते हैं। मेरी यह टीका करोड़ों लोगोंके बारेमें नहीं है। हिन्दुस्तानको असली रास्ते पर लानेके लिए हमें ही असली रास्ते पर आना होगा। बाकी करोड़ों लोग तो असली रास्ते पर ही हैं। उसमें सुधार, बिगाड़, उन्नति,[२] अवनति[३]समयके अनुसार होते ही रहेंगे। पश्चिमकी सभ्यताको निकाल बाहर करनेकी ही हमें कोशिश करनी चाहिये। दूसरा सब अपने-आप ठीक हो जायगा।

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मशीनें

पाठक : आप पश्चिमकी सभ्यताको निकाल बाहर करनेकी बात कहते हैं, तब तो आप यह भी कहेंगे कि हमें कोई भी मशीन नहीं चाहिये।

संपादक : मुझे जो चोट लगी थी उसे यह सवाल करके आपने ताजा कर दिया है। मि॰ रमेशचन्द्र दत्तकी पुस्तक ‘हिन्दुस्तानका आर्थिक इतिहास' जब मैंने पढ़ी, तब भी मेरी ऐसी हालत हो गई थी। उसका फिरसे विचार करता हूँ, तो मेरा दिल भर आता है। मशीनकी झपट लगनेसे ही हिन्दुस्तान पामाल


  1. खुदग़रज।
  2. तरक्की।
  3. गिरावट।