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हिन्द स्वराज्य


बंद हो गया है। फिर कट्टर बैर काहेका? और इतना याद रखिये कि अंग्रेजोंके आनेके बाद ही हमारा झगड़ा बन्द हुआ ऐसा नहीं है। हिन्दू लोग मुसलमान बादशाहोंके मातहत और मुसलमान हिन्दू राजाओंके मातहत रहते आये हैं। दोनोंको बादमें समझमें आ गया कि झगड़नेसे कोई फायदा नहीं; लड़ाईसे कोई अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे और कोई अपनी जिद भी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए दोनोंने मिलकर रहनेका फ़ैसला किया। झगड़े तो फिरसे अंग्रेजोंने शुरू करवाये।

‘मियां और महादेवकी नहीं बनती' इस कहावतका भी ऐसा ही समझिये। कुछ कहावतें हमेशाके लिए रह जाती हैं और नुकसान करती ही रहती हैं। हम कहावतकी धुनमें इतना भी याद नहीं रखते कि बहुतेरे हिन्दुओं और मुसलमानोंके बाप-दादे एक ही थे, हमारे अंदर एक ही खून है। क्या धर्म बदला इसलिए हम आपसमें दुश्मन बन गये? धर्म तो एक ही जगह पहुँचनेके अलग-अलग रास्ते हैं। हम दोनों अलग-अलग रास्ते लें, इससे क्या हो गया? उसमें लड़ाई काहेकी?

और ऐसी कहावतें तो शैवों और वैष्णवोंमें भी चलती हैं; पर इससे कोई यह नहीं कहेगा कि वे एक-राष्ट्र नहीं हैं। वेदधर्मियों और जैनोंके बीच बहुत फर्क माना जाता है, फिर भी इससे वे अलग राष्ट्र नहीं बन जाते। हम गुलाम हो गये हैं, इसीलिए अपने झगड़े हम तीसरेके पास ले जाते हैं।

जैसे मुसलमान मूर्तिका खंडन करनेवाले हैं, वैसे हिन्दुओंमें भी मूर्तिका खंडन करनेवाला एक वर्ग देखनेमें आता है। ज्यों ज्यों सही ज्ञान बढ़ेगा त्यों त्यों हम समझते जायेंगे कि हमें पसन्द न आनेवाला धर्म दूसरा आदमी पालता हो, तो भी उससे बैरभाव रखना हमारे लिए ठीक नहीं; हम उस पर जबरदस्ती न करें।

पाठक : अब गोरक्षाके बारेमें अपने विचार बताइये।

संपादक : मैं खुद गायको पूजता हूँ यानी मान देता हूँ। गाय हिन्दुस्तानकी रक्षा करनेवाली है, क्योंकि उसकी संतान पर हिन्दुस्तानका, जो खेती-प्रधान देश है, आधार है। गाय कई तरहसे उपयोगी जानवर है। वह उपयोगी जानवर है, यह तो मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे।