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गोला-बारूद

अगर मेरे घरमें मेरा पिता चोरी करने आयेगा, तो मैं एक साधन काममें लूँगा। अगर कोई मेरी पहचान का चोरी करने आएगा, तो मैं वही साधन काम में नहीं लूँगा। और कोई अनजान आदमी आयेगा, तो मैं तीसरा साधन काम में लूँगा। अगर वह गोरा हो तो एक साधन और हिन्दुस्तानी हो तो दूसरा साधन काम में लाना चाहिए, ऐसा भी शायद आप कहेंगे। अगर कोई मुर्दार लड़का चोरी करने आया होगा, तो मैं बिलकुल दूसरा ही साधन काममें लूँगा। अगर वह मेरी बराबरी का होगा, तो और ही कोई साधन मैं काम में लूँगा। और अगर वह हथियारबंद तगड़ा आदमी होगा, तो मैं चुपचाप सो रहूँगा। इसमें पिता से लेकर ताकतवर आदमी तक अलग अलग साधन इस्तेमाल किए जायेंगे। पिता होंगे तो भी मुझे लगता है कि मैं सो रहूँगा और हथियार से लैस कोई होगा तो भी मैं सो रहूँगा। पितामें भी बल है, हथियारबंद आदमी में भी बल है। दोनों बलोंके बस होकर मैं अपनी चीजको जाने दूँगा। पिताका बल मुझे दयासे रुलायेगा। हथियारबंद आदमीका बल मेरे मनमें गुस्सा पैदा करेगा; हम कट्टर दुश्मन हो जायेंगे। ऐसी मुश्किल हालत है। इन मिसालोंसे हम दोनों साधनोंके निर्णय[१] पर तो नहीं पहुँच सकेंगे। मुझे तो सब चोरोंके बारेमें क्या करना चाहिये यह सूझता है। लेकिन उस इलाज से आप घबरा जायेंगे, इसलिए मैं आपके सामने उसे नहीं रखता। आप इसे समझ लें; और अगर नहीं समझेंगे तो हर वक्त आपको अलग साधन काममें लेने होंगे। लेकिन आपने इतना तो देखा कि चोरको निकालनेके लिए चाहे जो साधन काम नहीं देगा; और जैसा साधन आपका होगा उसके मुताबिक नतीजा आयेगा। आपका धर्म किसी भी साधन से चोरको घरसे निकालने का हरगिज नहीं है।

जरा आगे बढें। वह हथियारबंद आदमी आपका चीज ले गया है। आपने उसे याद रखा है। आपके मनमें उस पर गुस्सा भरा है। आप उस लुच्चेको अपने लिए नहीं, लेकिन लोगों के कल्याण के लिए सजा देना चाहते हैं। आपने कुछ आदमी जमा किये। उसके घर पर आपने धावा बोलने का निश्चय किया। उसे मालूम हुआ। वह भागा। उसने दूसरे लुटेरे जमा किये। वह भी

  1. फैसला।