पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१७१

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                                 कबीर की साखी

अपने कर्मों को कुल्हाड़ी से अपने शरीर को काट रहा है ।जीवन को नष्ट कर रहा है ।

      विशेष -१ तुलना कीजिए
              कोउ न कड़ु सुख दुख कर दाता ।
              निज फुत कर्म भोग सुनु भ्राता ॥
                                     -मानस
       
       ॥२॥ रुपक अलंकर ।
       शब्दार्थ - कुहाड़ि = कुल्हाड़ा  ।
         
            कुल खोयां कुल ऊबरै ,कुल राख्यां कुल जाइ ।
            राम निकुल कुल मेंटि लै ,सब कुल रझा समाइ ॥
      सन्दर्भ - माया जन्य आकर्षणो को भुलाकर ही ब्रझा-प्राप्ति संभव है ।
      भावार्थ -सांसरिक वैभवो का त्याग करके ही सारे तत्व ब्रझ की प्राप्ति
 संभव है और यदि सांसारिक वैभवों की रक्षा का प्रयास किया गया तो ईश्वर -प्राप्ति असम्भव है इसलिए हे जीव । तू सांसारिक आकर्षणों से विरक्त होकर ब्रझ से मिल ले क्योंकि सारा संसार उसी में समाया हुआ है ।
         विशेष - कुल के दो होने से यमक अलंकार ।
          शब्दार्थ - कुल = सांसारिक वैभव । कुल = सारतत्व प्रभु ।निकुल =कुल रहित होकर ,

सांसारिक प्रलोभनो से विरक्त होकर । कुल = समस्त आनद के साधन ।

                   दुनिया के धोखै मुवा ,चलै जु कुल की कांणि ।
                   तब कुल किसका लाजस्री , जब ले धर्या मसांणि ॥
         सन्दर्भ - जीव ने यदि प्रभु -भक्ति ,साधु सेवा आदि सुकृत्य किये होते तो उसका नाश न होता ।
       भावार्थ - जो व्यक्ति कुल की मर्यादा आदि के प्रपंचों को लेकर चला वह सांसारिक भ्रमो का शिकार होकर मर गया । मृत्यु हो जाने पर जब शव को लेजाकर श्मशान की अपधिश्र भूमि मे रख दिया जाता है तब किसक कुल लज्जित होता है ?अर्थात किसी क नही ।
        शब्दार्थ -काणि= मर्यादा ,गौरव । लाजसो =लज्जा  करता है ।मसाणि = श्मशान ।