पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२०१

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१६०] [कबीर को साखी

ऱाम नाम के अमूल्य रत्न को पहचानता नही और पीतल के पात्र खाने के लिए घूमता रहता है उसी मे मस्त है यह ठीक नही है ।

   शब्दार्थ--तष्टा=तसला । टोकणी=टोकनी । सुभाइ=स्वभाव । चाइ=

चाव, इच्छा ।

         कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि धरी षटाइ ।
         राज दुवारां यौं फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाइ॥६॥
    संदर्भ--पाखंड करने और ईश्वर की भक्ति करने मे बहुत बड़ा अतर है।
    भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के स्वामी और सन्यासी

सभी लोभी हैं वे बाहर से देखने मे तो विरक्त लगते है और अंतःकरण मे लोभ व्याप्त रहता है जिस प्रकार पीतल पर खटाई लगा देने से क्षण भर के लिए उसमे चमक आ जाती है उसी प्रकार ऐसे पाखंडी सन्यासी भी क्षण भर के लिए विरक्त हो जाते हैं। जिस प्रकार हरियाली के लोभ मे पड़ी हुई गाय बार-बार रोकने पर भी ही खेत की ओर दौडती चली जाती है उसी प्रकार वे सन्यासी भी लोभासक्त होकर धनवानो के दरवाजे पर जाया करते हैं ।

    शब्दार्थ-हरिहाई=जो ह्टाने पर भी नही हटती है ।
        कलि का स्वांमी लोभिया,मनसा धरी बधाइ ।
        दैं हि पईसा व्याज कौं, लेखां करतां जाइ॥७॥
 संदर्भ-कलियुग के सन्यासी लोभी वृत्ति के होते हैं।
 भावार्थ-कलियुग के स्वामी सन्यासी अत्यन्त लोभी होते है वे अपनी

इच्छाओ-अभिलापाओ को अत्यन्त बढा चढ़ाकर रकते हैं। वे व्याज पर रुपया उधार देते हैं और वढ़ी-वडी वहियो(वहीखाता) मे उसका हिसाब रकते हैं तब भला बताइए कि उनमे और एक ससारी प्राणी मे क्या अन्तर है?

     शाब्दार्थ-मनसा=इच्छाएं,अभिलाषाएं।
         कबीर कलि खोटी भइ,मुनियर मिलै न कोइ।
         लालच लोभी मसकरा,तिनकू श्रादर होइ॥८॥
 संदर्भ--कलियुग मे लोभी और मनचले लोग ही सम्मान के पात्र

होते हैं।

 भावार्थ--कबीरदास जी कहते हैं कि यह कलियुग अत्यन्त खोटा है इसमें 

कोई श्रष्ठ मुनि नहीं मिल पाता है इसमे तो उन्ही व्यक्तियो का सम्मान हो पाता है जो लालची,लोभी और मनचले होते हैं ।

   शब्दार्थ-मुनियर=मुनिवर=श्रेष्ठमुनि। मसकरा=मसखरा, मनचला।