पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२१३

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 सन्दर्भ-स्त्री के सम्पकं से ईश्वर भक्त ही बच पाते हैं ।
 भावार्थ-जिस प्रकार नरक कुंड अपवित्र होता है उसी प्रकार स्त्री भी अपवित्र होती है अपनी इन्द्रियरुपी लगाम को विरले व्यक्ति ही रोक पाते है। संपूणं संसार स्त्री मोह मे पडकर मरकर विनप्ट हो गया केवल कुछ साधु व्यक्ति ही इसके प्रलोभन से बचकर भव सागर पार कर पाते हैं ।
 शब्दार्थ-थभै=थामना रोक पाना । वाग=लगाम ।
 विशेष-रुपक अलकार ।
     सुंदरी थैं सूली भली, विरला बंचै कोइ ।
     लोह निहाला श्रगनि मैं,जलि बलि कोइला होय ॥ १६ ॥
 सन्दर्भ-नारी दृढ चरित्र वले को व्यक्ति को भी पथ भ्रष्ट कर देती है ।
 भावार्थ-सुन्दरी स्त्री से शूली फिर भी अच्छी होती है क्योकि स्त्री के

घातक प्रभाव से विरला व्यक्ति ही बच पाता है । श्रेष्ठ से श्रेष्ठ लोहे को भी अग्नि जलाकर कोयला बना देती है उसी प्रकार स्त्री भी श्रेष्ठ से श्रेष्ठ पुरुष को भी नष्ट भ्रष्ट कर देती है ।

 शब्दार्थ-निहाला=डालना ।
   त्र्प्रंधा नर चेतै नहीं, कटै न संसै सूल ।
   त्र्प्रोर गुनह हरि बकससी, काँमी डाल न मूल ॥ १७ ॥
 सन्दर्भ-कामी व्यक्ति के अवगुणो को ईश्वर क्षमा नही करता है ।
 भावर्थ-कामान्ध व्यक्ति को कभी चेत नहीं आता वह सदैव असावधान

ही रहता है जसके सशय का निवारण भी नही हो पाता है । अन्य गुनाहो को दोषो को तो ईश्वर क्षमा कर देता है किन्तु कामी व्यक्ति तो कहीं का भी नही रहता है न तो उसके हाथ मे यह लोक रहता है और न परलोक ।

 शब्दार्थ-अन्धा=कामान्ध । गुनह=गुनाह, दोप ।
   भगति बिगाड़ी काँमियाँ, इंद्री केरै स्वादि ।
   हीरा खोया हाथ थै, जनम गॉवाया वादि ॥ १८ ॥
 सन्दर्भ-मानव जन्म का उदेश्य एक मात्र प्रभु भक्ति ही है ।
 भावार्थ-कामी पुरुषो ने इन्द्रियो के स्वाद के लिये भक्ति मांग को नष्ट

कर दीया उन्होने हीरा ऐसे अनमोल भक्ति मागं को अपने हाथ से खो दिया और सांसारिक विषयों मे पढ़ कर अपने जन्म को व्यथं ही खो किया ।

 शब्दार्थ-कांमियां=कामी पुरुष । वादी=व्यथं ।
 विशेप-रुपक अलकार ।