(iii)छेकानुप्रास—गगन गाजै, चित चेतन।
(v)पदमैत्री—खडू बिहडू, आऊ जाऊँ।
विशेष—(i) प्रतीकों का प्रयोग है।
(ii) कार्यायोग के साधनों से आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति तथा उन प्रतीकों के माध्यम से आध्यात्मिक साधना का वर्णन है।
(iii) अनहद नाद—देखें टिप्पणी पद सख्या १५७।
(iv) शून्य—देखें टिप्पणी पद संख्या १६४।
(v) नाद बिंदु—देखे टिप्पणी पद सख्या १८।
(vi) वाह्योपचारो का विरोध है।
(vii) सालिगराम काटौं—कहता यह है कि कबीर शालिगराम की पूजा छोडने से कबीर का तात्पर्य यह है कि वह सीमित तत्त्व की औपचारिक उपासना का त्याग कर देंगे और व्रह्यादिक जो माया जनित देव हैं, उनका अस्तित्व ही मिटा देंगे।
(viii) सायर फोडि पाटौ—मूलाधार चक्र के जल का शुन्य-शिखर के सरोवर-जल से सम्मिलन करूँगा अर्थात् विषयानंद को साधनाजन्य आनद एवं आध्यात्मिक आह्लाद में समाहित कर दूँगा। गगन कूप की बूँदो को टपक-टपक कर चण्डाग्नि में भस्म नहीं होने दूँगा अर्थात् उसकी शक्ति को विषय-वासनाओं में नष्ट नहीं होने दूँगा। उससे आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करता रहूँगा।
(viii) बन वन डोलै। तुलना करें—
कस्तुरी कुण्डल बसै मृग ढुँढै वन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं दुनियाँ देखे नांहि।(कबीरदास)
(१९७)
बाबा पेड़ छाडि सब डालीं लागे, मूंढे जंत्र अभागे।
सोइ सोइ सब रैणि बिहांणी, भोर भयौ तब जागे॥ टेक॥
देवलि जाऊ तौ देवी देखौं, तीरधि जांऊ त पाणीं।
ओछी बुधि अगोचर वांणीं, नहीं परम गति जांणी॥
साध पुकारै समझत नांहीं, आंन जन्म के सूते।
बांधै ज्यूँ अरहट की टीडरि, आवत जात बिगूते॥
गुर बिन इहि जग कौंन भरौसा, काकै सगि ह्वै रहिये।
गनिका कै धरि बेटा जाया, पिता नांव किस कहिये॥
कहै कबीर यह चित्र विरोध्या, बूझी अंमृत बांणी।
खोजत खोजत सतगुर पाया, रहि गई आंवण जांणीं॥
शब्दार्थ-मूनं यन्। पन्मतत्त्व, ब्रहा। डाली=शाखाएँ=अन्य देवता व्यक्त ज्ञाप रुप। हृप्र-टामूर्ण।ऊंणरौटु दृययमान जगत।