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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३२४

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ग्रन्थावली]
[६३९
 

कहते हैं कि बाहरी वेष धारण करने से नहीं अपितु सच्ची भावना से व्यक्ति भक्त अथवा साधक बनता है। ठीक ही है—

जप माला छापै तिलक सरै न एकौ काम।
मन काचे नाचे वृथा साँचै राचै राम।(बिहारी)

(२१८)

हैं कोई राम नांम बतावै,
बस्तु अगोचर मोहि लखावै॥ टेक॥
रांम नांम सब कोई बखांनै, रांम नांस का मरम न जांनै॥
ऊपर की मोहि बात न भावै, देखै गावै तौ सुख पावै॥
कहै कबीर कछू कहत न आवै, परचै बिनां मरम को पावै॥

शब्दार्थ—अगोचर=इन्द्रियो के लिए अगम्य। लखावै=दिखावै। ऊपर की बात=कही सुनी अथवा पढी-पढाई। परचै=परिचय।

सन्दर्भ—कबीर कहते हैं कि आत्मानुभूति के बिना राम का रहस्य समझ में नहीं आता है।

भावार्थ—कोई ऐसा सन्त है जो मुझे राम नाम के रहस्य को समझाकर उस अगभ्य एव अगोचर परम तत्व का साक्षात्कार करा दे? वैसे राम-नाम की चर्चा तो सभी लोग करते हैं परन्तु राम नाम के वास्तविक रहस्य कोई नहीं जानता है। सुनी-सुनाई अथवा पढी-पढाई बातों की चर्चा मुझको अच्छी नहीं लगती है। यदि कोई व्यक्ति भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार करके इसका वर्णन करता है तो उसकी बात सुनकर मुझको आनन्द की प्राप्ति होती है अथवा आत्मानुभव करने वाले की बात सुनना ही मुझको रुचिकर प्रतीत होता है। कबीर कहते हैं कि उस परम तत्व (भगवान) के विषय में कुछ कहते नहीं बनता है अर्थात् वह शब्दातीत है। साक्षात्कार के बिना उसके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान किसी को प्राप्त नहीं होता है।

अलकार—(i) वक्रोक्ति—प्रथम एव अतिम पंक्ति।
(ii) विरोधाभास—वस्तु लखावै।
(iii) विशेषोक्ति की व्यजन—राम नाम जानै।
(iv) पदमैत्री—भावै पावै, आवै पावै।
(v) अनुप्रास—कहै कबीर कछू कहत।

विषेश—(i) कबीर सच्ची अनुभूति प्राप्त करने के लिए सदैव उत्सुक रहा करते थे। वाह्याचार उन्हे किसी भी दशा में रुचिकर नहीं था। वाह्याडम्बर को वह प्राय ढोग ही मानते थे।

(ii) राम का स्वरूप वर्णनातीत एव अगम्य है। उसका मर्म कोई नहीं जानता है। यह ता गू गे का गुड है। इसकी अगम्यता का वर्णन दार्शनिक एव भक्तजन समान रूप से करते आए हैं। देखें—