मुगध=मूर्ख। राखत=रक्षा करता हुआ। असराल=असधार, आँसुओ की धार। जिभ्या=जीभ। सुकरति=सुकृत, पुण्य। तलव=बुलावा।
सदर्भ—कबीर जीवन की क्षण भगुरता का प्रतिपादन करते है और कहते हैं कि राम-नाम का स्मरण अवश्य करना चाहिये।
भावार्थ—हे जीव! अहभाव तथा अपना-तेरी के फेर मे तेरा सम्पूर्ण जीवन व्यतीत हो गया। तूने अपना सम्पूर्ण जीवन इसी प्रकार व्यर्थ गँवा दिया, परन्तु भगवान का नाम नही लिया। प्रारम्भ के बारह वर्षो तक तो तू बालक बना रहा और वह समय वालकपन के नाम पर खेलकूद मे नष्ट कर दिया। इसके बाद बीस वर्ष की अवस्था तक (किशोरावस्था मे) किसी प्रकार की साधना नही की। तीस वर्ष की अवस्था तक (अथवा युवावस्था मे) तूने राम का भजन न किया इसके बाद तेरी वृद्धावस्था आ गई और अब तू पश्चाताप करने लगा। जीवन व्यतीत हो जाने पर पश्चाताप करना व्यर्थ है। यह तो तालाब के सूख जाने के बाद उसके चारों ओर मेड बाँधने के समान है अथवा काटे हुए खेत की रखवाली के लिए उसके चारो ओर बाड लगाना है। यह तो ऐसा ही है जैसे चोर आकर किसी का घोडा चुरा कर ले गया हो और उसका मूर्ख स्वामी उसकी रास पकडे घूम रहा हो (और इस भ्रम मे हो कि घोडा उसके अधिकार मे है।) अब तो सिर, पैर, हाथ सभी अग कॉपने लगे हैं और आँखो से बराबर पानी बहता रहता है। जीभ मुख) से ठीक तरह बोला नही जाता है। पूर्ण शक्तियो के नष्ट हो जाने के बाद अब तू पुण्य-कृत्य की बात करता है। कबीरदास कहते हैं कि हे सतो! अनेक व्यक्तियो ने धन का सचय किया। वह धन-सम्पत्ति किसी के साथ नहीं गई। भगवान का बुलावा आते ही उन्हे गृह द्वार छोड़कर चला जाना पडा। अथवा इस जीव ने भी बहुत सी सम्पत्ति एकत्र कर रखी है। अन्य जीवो की भाँति इसके साथ भी कुछ नही जाएगा और भगवान का बुलावा आने पर इसको भी घर-द्वार, महल, मन्दिर सब कुछ छोडकर चल देना पडेगा।
- अलकार—(i) पुनरुक्ति प्रकाश—मेरी मेरी।
- (ii) वृत्यानुप्राम—बारह बरस बालापन, बिप बरस।
- (iii) दृष्टान्त—सूकै फिरै।
विशेष—समभाव के लिए शकरचार्य का भज गोविन्द स्तोय देखें-अग गलित तलितं गुड इत्यादि।
(२४४)
जाहि जाती नांव न लीया,
फिरि पछतावै गौ रे जीया॥ टेक॥
धधा करत चरन कर घाटे, आउ घटी तन खीना।
विषै बिकार बहुत रुचि मांनी, माया मोह चित दींन्हां॥