विशेष—(i) इस पद मे साम्प्रदायिक भावना के ऊपर करारी चोट है।
(ii) कबीर का कहना है कि सभी सम्प्रदायो मे भेद-बुद्धि है। अत: ये अपने ईश्वर को एक विशेष रूप मे सीमित करके देखते हैं।
(iii) विभिन्न शब्दो के व्युत्पत्तिपरक अर्थ देकर मूल धर्म-भावना के उद्बोधन का प्रयास है।
(३३१)
आऊँगा न जाऊँगा, मरूँगा न जीऊँगा।
गुरु के सबद मै रमि रमि रहूँगा॥ टेक॥
आप कटोरा आपै थारी, आपै पुरिखा आपै नारी॥
आप सदाफल आपै नींबू, आपै मुसलमांन आपै हिंदू॥
आप मछ कछ आपै जाल, आपै झींवर आपै काल॥
कहै कबीर हम नांहीं रे नांही, नां हम जीवत न जुवले माँहीं॥
शब्दार्थ—मुवले=मरे हुए। सदाफल=नारियल।
सन्दर्भ—कबीरदास जीवन के मिथ्यात्व द्वारा एक परम तत्त्व की सत्ता का प्रतिपादन करते हैं।
भावार्थ—शुद्ध चैतन्य का प्रतिनिधित्व करते हुए कबीर कहते हैं कि मैं, न जन्म लूँगा, न मरूँगा और न यह सामान्य जीवन ही व्यतीत करूँगा। मैं गुरु उपदेश द्वारा प्रतिपादित परम तत्व (राय) मे ही रमता रहूँगा। आत्मा तत्व को सब कुछ बताते हुए वह कहते हैं कि वही थाली है और वही कटोरा है। वह स्वय ही पुरुष है, और वही नारी है। वही सदैव फलने वाला नारियल है, वही नीवू है, वही मुसलमान है और वही हिन्दू है। वही मछली है, वही कछुआ है। वही उनको फँसाने वाला जाल है, वही उस जाल को फैलाने वाला मछुआ है तथा वही उनको मारने वाला काल है। कबीरदास कहते हैं कि हमारा कोई किसी प्रकार का अस्तित्व नही है। हम न जीवित कहे जा सकते हैं और न मरे हुए ही कहे जा सकते हैं।
- अलंकार—(i) पद मंत्री—आइ गा—जीऊँगा। मछ कछ।
- (ii) पुनरुक्तिवदाभास—जाऊँगा मरूँगा।
- (iii) उल्लेख—एक ही तत्व का विभिन्न रूपों मे वर्णन होने के कारण।
- (iv) पुनरुक्ति प्रकाश—नाही रे नाही,
विशेष—(i) समस्त दृश्यमान जगत (रूपात्मक जगत) के मूल मे एक ही तत्व को सत्ता बताकर 'अद्वैत वाद' का प्रतिपादन है।
(ii) आऊँगा—रहूँगा—शुद्ध चैतन्य सर्वव्यापी एव सदा रहने वाला तत्व है। अत उसका न आने का प्रश्न है और न जाने का, न जन्म का और न मरण का। जब माया चैतन्य मे बिना गतिशील नही हो सकती है। जड मे गति, और