शब्दार्थ- ऊग्या = उदित हुआ । आथवै = अस्त होता है । चिणियाँ =चुना गया ।
जो पहर्या सो फाटिसी, नांव धर्य सो जाइ ।
कबीर सोई तत्त गहि, जौं गुर दिया बताइ ॥ १२ ॥
सन्दर्भ- संसार की नश्वरता पर दुख प्रकट करते हुए कबीरदास जी प्रभु भक्ति करने की सलाह देते हैं ।
भावार्थ - जो नया वस्त्र शरीर पर धारण किया जाता है वह कभी न कभी अवश्य फटता है । जिस नाम को जीव ने इस संसार मे रखा है वह नाम भी उसकी मृत्यु के वाद धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा । इसलिए कबीर दास जी कहते हैं कि जिस तत्व को सद्गुरु ने बता दिया है उसी तत्व को ग्रहण करना चाहिए । को
शब्दार्थ - तत्त = तत्व ।
निधड़क बैठा रांम बिन, चेतनि करै पुकार ।
यहु तन जल का बुदबुदा, बिनसत नाहीं बार ||१३||
संदर्भ - मनुष्य का शरीर पानी के बुदबुदे के समान नश्वर है अतः मनुष्यो प्रभु भक्ति करनी चाहिए ।
भावार्थ- जीवात्मा को अज्ञानावस्था मे पड़ा हुआ देखकर चैतन्य अर्थात् ज्ञानी उससे पुकार कर कहता है कि प्रभु भक्ति के विना तू निघड़क क्यो बैठा है । यह शरीर पानी के बुदबुदे के समान है जिसको नष्ट होने मे देर नहीं लगती । इसलिए तू प्रभु भक्ति कर
शब्दार्थ - विनसत= नष्ट होते हुए । वार = विलम्ब ।
पांणीं केरा बुदबुदा इसी हमारी जाति ।
एक दिनां छिप जाँहिंगे तारा ज्यूँ परभाति ॥ १४ ॥
संदर्भ - जीव को नश्वरता का संकेत है ।
भावार्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि हम मनुष्यो की जाति पानी के बुद- बुदो के समान ही क्षरण भंगुर होने वाली है । तारे रात्रि भर आकाश मे छिटके रहते हैं और प्रभात होते ही अदृश्य हो जाते हैं उसी प्रकार मनुष्य भी कुछ दिन संसार में रह कर यहाँ से चला जायगा ।
शब्दार्थ - पांणी = पानी । परभाति:- प्रभात ।
विशेष - उदाहरण अलंकार ।
कबीर यहु जग कुछ नहीं, पिन पारा पिन मीठ ।
काल्हि जु बैठा मांड़ियां, आज मसाणां दीठ ||१५||