पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


गुरुदेव को श्रंग

   सतगुरु सवाँन को सगा , सोधी सई न दाती ।
   हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाती ॥ १ ॥

सन्दर्भ - सतगुरु का व्यक्तित्व असाधारन , स्मादरगगोय और अत्यन्त कल्याणकारी है| वह मुक्ति और भक्ति का भण्डार है| वह हरिजो और हरिजन से भी श्रेष्ट है|

भावार्थ- सतगुरु के समान कौन सगा है, कौन अपना है| उसके समान कोई भी शोधक नही है| वह अमोघ, अजस्त्रदाता है| हरिजो अर्थात भगवान को सदृश कौन हितैषी है और हरिजन अर्थात वैष्णवजन के समान कोई जाति नही है, उसके समान कोई फुलोन नही है|

शब्दार्थ-- सवान= समान, बराबर| को=कौन| सगा= स्वक=अपना, अभिन्न|सोधी=शोधी-सशोदन करने वाला, शोधक|सई= समान| दाति= दातृ, दानी| हितु-हितैषी|

   बलिहारी गुरु श्रापर्णै, द्यौं हाडी कै बार|
   जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी घार||२||

सन्दर्भ- सतगुरु मे दिय्व शक्ति है| उन्होने हाडी के सहज इस तुच्छ, होन शरीर को दिव्यता प्रदान को| उनके प्रसाद से यह शरीर सब सार्थक हो गया|

भावार्थ- सतगुरु के श्री चरणो पर मै अपने इस शरीर को अधम पंचत्तवो से विनिमिन शरीर को जो हाडी के नहद नि:मार है-शतज: वार न्यौछावर करता है। सतगुरु को मुख दोषो से अभिराम यामनाओ से प्रस्त अधन प्राणो को दिखाता प्रदान करने मे चिलम्ब न लगा। यही उनकी महत्ता थी।

शब्दार्थ- बलिहारि=न्यौछावर। आपनौ=सरने, मेरे। हाडी- मृतिका पात्र। के= बितनी। के बार= कितनी बार। जिनि= जिन- जिन्हे। नानिप= मानुष्य। नै=ने। वार= विलम्ब।

   सतगुरु की महिमा श्रनेन श्रनेन किया उपगार।
   लोचन अनँत उघडिया अनँत दिग्णवखहार॥३॥