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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/८४२

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[कबीर
 


ए अभिमान सब मन के कांम, ए अभिमांन नहीं रहों ठाम॥
आतमां राम कौ मन बिश्रांम, कहि कबीर भजि रांम नांम॥

शब्दार्थ—मद=उन्माद, गर्व। माते=मस्त, बेसुध। मुसन लाऊ=लूट रहे है।

सन्दर्भ—कबीरदास संसारी व्यक्तियों की अज्ञान-दशा का वर्णन करते हैं।

भावार्थ—समस्त संसार मन्दान्ध (उन्माद एवं गर्व में अन्धा होकर अज्ञान की निद्रा में मदहोश होकर सो रहा है। कोई भी ज्ञान लाभ कर सचेत नहीं होता है। इसी से साथ में लगे हुए कामादिक चोर जीव के शरीर को (जीवन को) लूट रहे हैं। (विवेक को नष्ट तथा विशुद्ध चैतन को तिरोहित कर रहे हैं।) पंडित पुराण पढ़कर मदमस्त हैं, योगी ध्यान-योग के अहंकार में मदहोश हैं। सन्यासी 'अहमेव' की भावना के अहंकार में तथा तपस्वी तप के भ्रम में अपने आपको भूले हुए हैं। शुकदेव, उद्धव, अक्रूर, और जामवंत सहित हनुमान ईश्वर-प्रेम में अनुरक्त होकर ही इस अज्ञान-निद्रा से जागे थे। शंकर को भी भगवान के चरणों की सेवा से ही बोध हुआ था। कलियुग में नामदेव और जयदेव को भी (इसी प्रकार) ज्ञान हुआ। (ज्ञान तप आदि के) उपर्युक्त समस्त अभिमान केवल मन में उत्पन्न होते हैं। इन अभियानों के कारण साधक का मन सदैव चंचल बना रहता है। इसी से कबीर कहते हैं कि आत्मारामों के मन के विश्राम राम-नाम का भजन करना चाहिए—अर्थात् मन का वास्तविक विश्राम आत्माराम है। वहां पर मन अपनी सम्पूर्ण चंचलता सहित शुद्ध चैतन्य में विलीन हो जाता है। यह ज्ञान और प्रेम द्वारा ही सम्भव है। इसी से कबीर कहते हैं की, हे जीव, राम-नाम का स्मरण करो।

अलंकार—रूपकातिशयोक्ति – चोर, घर

विशेष—(i) दम्भ उत्पन्न करने वाले बाह्माचारों का विरोध है। साथ ही सच्ची भक्ति-भावना का प्रतिपादन हैं।

(ii) पुराण एवं इतिहास प्रसिद्ध भक्तों की चर्चा द्वारा तीन बातें प्रकट होती है—(क)कबीर का विरोध केवल दम्भ से था। जहाँ भी सचाई थी, वहाँ कबीर का मन रम जाता था। (ख) भारत में पौराणिक संस्कृति का व्यापक प्रभाव था। जनता के मन को प्रभावित करने के लिए पौराणिक पात्रों का उल्लेख आवश्यक था। तथा (ग) कबीर के ऊपर हिन्दू संस्कारों का गहरा प्रभाव था।

(३८८)

चलि चलि रे भवरा कवल पास,
भवरी बोलै अति उदास ॥टेक॥
तै अनेक पुहप कौ लियौ भोग, सुख न भयौ तब बढ्यौ है रोग॥
हौं ज कहत तोसूं बार बार, मै सब बन सोध्यौ डार डार॥
दिनां चारि के सुरंग फूल, तिनहि देखि कहा रह्मौ है भूल॥
या वनासपती मे लागैगी आगि, तब तू जैहौ कहां भागि॥