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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/८७९

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ग्रन्थावली]
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देती है। वह तिल के समान थोडे से विषयानंद के पीछे सुमेरु पर्वत के समान वृहद् दुखो को अपना लेता है और इस प्रकार वह चौरासी लाख योनियो में भटकना स्वीकार करता है। इस ससार में सुख थोडा है और दुख बहुत है, परन्तु फिर भी मन रूपी हाथी इन विषयो में मस्त बना हुआ फूल रहा है। वासना के दीपक की लौ जीव के साथ लगी हुई है। उसके नेम (इन्द्रियो के उपलक्षण) उसके प्रति आसक्तिवश आकृष्ट होकर उसमे पतगो की तरह गिरकर भस्म होते रहते हैं। जो जन ईश्वर प्रेम रूप सत्य को छोडकर विषयासक्ति रूप झूठ की ओर दौडते हैं, उनको सुख-शान्ति की प्राप्ति कभी भी नहीं होती है। विषयों के लालच में लोग अपना सारा जीवन नष्ट कर देते हैं। अत काल आने पर वे घबडा कर भागना चाहते हैं। जब तक यह जीव इस शरीर के सुखोपभोग में अपने आपको भूला रहता है, तबतक वह जग कर विषय-वासनाओ के इस दुखात्मक रूप को नहीं देख पाता है। जब वह शरीर को छोडकर प्रयाण करता, तब उसकी समझ में यह बात आती है कि उसने अनुचित काम ही किया और फिर वह पश्चाताप करने लगता है। विषय वासनाओं की मृगतृष्णा दिन प्रतिदिन बढती जा रही है। मुझे अब इस जीवन में कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है। मैंने कर्म-बन्धन को समाप्त करने के लिए अनेक प्रयत्न किये, परन्तु कर्म के बन्धन समाप्त होने में नहीं आ रहे हैं।

अलंकार—विरोधाभास—सुपना जाना, दुख लेखा,
(ii) रूपकातिशयोक्ति—विषहर, पारधी, लहरि।
(iii) रूपक—विष वान, मन मैगल, नैन पतगा।
(iv) साग रूपक—काल जाइवे।
(v) उदाहरण—नीव ससारा।
(vi) सभंग पद यमक—दिन दिनहि, जानि अजानि।
(vii) पुनरुक्ति प्रकाश—मुरछि मुरछि, दिन दिन।
(viii) विभावना—काजी विनासा।
(ix) विशेषोक्ति—अनेक जतन नही जाइ।

विशेष—(i) ईश्वर-प्रेम से रहित समस्त साधनाएँ व्यर्थ हैं।

(ii) कस गहे चहई—समभाव के लिए देखें—

कबिरा गर्व न कीजिए, काल गहे कर केस।
ना जानै कित मारिहै, क्या घर क्या परदेस।

(१४)

रे रे मन बुधिवंत भंडारा, आप आप ही करहु बिचारा॥
कवन सयांन कौन बौराई, किहि दुख पाइये किहि दुख खाई॥
कवन सार को आहि असारा, को अनहित को आहि पियारा॥
कवन साच कवन है झूठा, कवन करूँ को लागै मीठा॥
किहि जरियै किहि करिये अनदा, कवन मुकति को मल के फंदा॥