पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/८८

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   गुरुदेव की अग ]                                        [ ७७
        संदर्भ-- कबीर ने प्रस्तुत साखी का भाव "सतगुरु को अग" को २१ वीं 

साखी मे व्यक्त करते हुए कहा है "सतगुर बपुरा क्या करे, जै सिपाही माँहै चूक।" इसि भाव को किंचित अधिक विस्तार के साथ व्यत्क करते हुए कवि ने सुन्दर अप्रस्तुत, योजना की अयोजना की हे ।

        भावार्थ--यदि मन ही भूलो से भरा है तो, सतगुरु का मिलना और न 

मिलना समान है । यदि पाम मे विनष्ट या फटा । कपडा है, तो उसके आधार पर तैयार किया हुआ अगोवस्थ्र की क्या उपयोगिता होगी ।

        विशेश--प्रस्तुत साखी मे पुलभ एव सरल अप्रस्तुत योजना के माध्यम मे 

कबीर ने यह कहा है कि यदि शिष्य का मन माया मे ही अनुरक्त है तो सतगुरु बेचारे का क्या दोष । फटे हुए कपडे से शरीर नही ढका जाता है । यदी इतना होने पर भी कोई फटे हुए वस्त्र से चोल या चीली मिले और उससे शरीर आवृत नहीं सकते, क्पडे का क्या दोष ।

        श्ब्दार्थ--त = सो । का = क्या । भवा = हुआ । जो = यदी । पाडी = 

पारी या काछादित । भोल = भ्रम । पासि = पास आधिकार मे । विनठा = विनप्ठ । कप्प्डा = कपडा । चोल = चोली ।

               बूड़े थे परी ऊबरे, गुर की लहऱि चमंकि ।
               मेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरकि॥२४॥
        संदर्भ--गुरुदेव की अग की २० वी साखी मे कबीर ने गुरु को अद्वितीय 

शक्ति का उल्लेख किया है, जिसकी कृपा से एक आध शिष्य का उद्धार होता है । कबीर ने उक्त साखी मे कहा है " कहै कबीर गुर ग्यान थै एक आध उबंरत ।" यहाँ पर कबीर ने पुन: उसी आशय को अभिनय अप्रस्तुत योजना द्वारा नये शब्दों मे व्यत्क किया है ।

        भावार्थ--हम भव सागर मे मग्न थे । पर गुरु की (कृपा के) लहर सनक 

देखकर मेरा उद्धार हो नया । मनपूर की कृपा प्रात्त होते ही मैने जर्जर बेडा का परित्याग कर दिया ९और उस पर मे फडक कर उतर पडा।

        विशेष--गुरु की कृपा अगाध और निःगीम है यदा सागर । सागर की 

उतड्ग लहरो मे प्रजल शकि होनी है । उसी प्रकार सागर के समान गम्भीर, ध्यापक नि:साम सतगुरु का व्यक्तित्व है उन्की कूस लहरो मे अद्भुत शक्ति है । वह शिष्य का उद्धार करने मे मशक है । (२) बूडे थे परि ऊबरे" है भर सागर मे डूबे थे पर उद्धार हो गये । (३) "लहरि" से 'कृपा को मार ।' (४) "चमंकि" चमक या प्रकाश । गुरु की कृपा की ज्योति प्रकरित रूप का प्रकाशित ।