पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/९०

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यहाँ पर उन स्वांग भरने वालो की ओर सकेत किया गया है जो यती के भेप को धारण कर भिक्षाजंन मे प्रवृत है। भावार्थ- कबीर दास कहते हैं कि (शिष्य को) सद्गुरू प्राप्त हुआ और दोक्षा या शिक्षा अपूर्ण रही। यती का वेष धारण करके (अधुरी शिक्षा प्राप्त शिष्य) भिक्षाजंन करते फिरते हैं।
विशेष-- अनुभव एवं ज्ञान से शुन्य गुरु जो शिक्षा देता है, बह अपूर्ण या अधूरी शिक्षा ही अपूर्ण ज्ञान, नीतिकरो ने विनाशकारी माना है । (२) कबीर ने वेश स्वाग या तमाशा माना हैं।
शब्दार्थ-- स्वार्ग = तमाशा। जती = यती। पहरि = पहन। घरि = घर। भीष = भीख = भिक्षा। सीष = सीख = शिक्षा।
सतगुरु साँचा सूरवाँ, तातैँ लोहिं लुहार। कसखी दे कंचन किया, ताइ लिया ततसार ॥२८॥
सन्दर्भ--कृत्रिम या असगत गुरु मिलने का प्रतिफल होता है, "अधै अधा ठँलिया, दून्यू कूप पडत" तथा "दून्यू बूड़े धार मैं चढि पाथर की नाव।" सतगुर के सम्पर्क मे आने का क्या प्रभाव होता है। इसका उल्लेख कबीर ने प्रस्तूत "अंग" की साखी ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२, १३ आदि मे अकित किया है। यहाँ पर पुन कबीर ने सतगुरु की वन्दना करते हुए उसे तत्व एवं सार का शोधक माना है।
भावार्थ-- मतगुर सच्चा शुरमा है। यथा लुहार लोहे को दग्ध करके शुद्ध करता है उसी प्रकार साधना की अग्नि में तप्त करके शिष्य को शुद्ध कर लिया है। शिष्य को साधना की कसौटी मे कस कर कर कंचनवत् बना लिया है और सार तत्व को सम्प्राप्त कर लिया है। विशेष- प्रस्तुत नाखो मे साधना की अग्नि मे शिष्य को निर्मल कर लेने का, उल्लेह है। माया के अमार तत्व साधना की कसौटी से ही दूर किए जा सकते हैं।
शब्दार्थ-- साँचा = सच्चा। सूरिव = सूरमा = सूग्मा। तातै = तात = तप्त। कनणो = कमनो = कसौटी मे कसने की प्रक्रिया। तत = तत्व । ५.५.६.२
थापणि पाई चिवि भई, सतगुर दीन्हीं धीर। कबीर हिराणजिवा, मानसरोवर तीर ॥२९॥
सन्दर्भ--प्रस्तुत साधी मे कवि ने "नवगुर की अग" को साधा २३ मया १२ का भाप उग यरियर्शन के नाथ किया गम है। कत-हुम् ने कह एव निब