पृष्ठ:Ramanama.pdf/३१

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                  ईश्वर कौन और कहा है?                             २३

इसलिए हम सब ईश्वरके अवतार है। मगर ऐसा कहने से कोई मतलब हल नही होता । राम, कृष्ण वगैराको हम अवतार कहते है, क्योकि उनमे लोगो ने ईश्वरके गुण देखे । आखिर तो राम, कृष्ण वगैरा मनुष्यकी ख्याली दुनियामे बसते है और उसकी ख्याली तसवीरे ही है। इतिहासमे ऐसे लोग हो गए या नही, इसके साथ इन कल्पनाकी तसवीरोका कोई सम्बंध नही । कई बार हम इतिहासके राम और कृष्णको ढूंढते-ढूंढते मुश्किलोमे पड़ जाते है और हमे कई तरहकी दलीलोंका सहारा लेना पड़ता है। सच बात तो यह है कि ईश्वर एक शक्ति है, तत्त्व है, शुद्ध चैतन्य है, सब जगह मौजूद है। मगर हैरानीकी बात यह है कि ऐसा होते हुए भी सबको उसका सहारा या फायदा नही मिलता, या यो कहे कि सब असका सहारा पा नही सकते । बिजली एक बड़ी ताकत है। मगर सब उससे फायदा नही उठा सकते । उसे पैदा करनेका अटल कानून है। उसके मुताबिक काम किया जाय, तभी बिजली पैदा की जा सकती है । बिजली जड़ है, बेजान चीज है । उसके इस्तेमालका कायदा चेतन मनुष्य मेहनत करके जान सकता है। जिस चेतनामय बड़ी भारी शक्तिको हम ईश्वर कहते है, उसके इस्तेमालका भी नियम तो है ही। लेकिन यह चीज बिल्कुल साफ है कि उस नियमको ढूढनेके लिए बहुत ज्यादा मेहनतकी जरूरत है । एक शब्दमे उस नियमका नाम है ब्रह्मचर्य । ब्रह्मचर्यको पालनेका सीधा रास्ता रामनाम है। यह मै अपने अनुभवसे कह सकता हू । तुलसीदास जैसे भक्त और ऋषि-मुनियों नें तो वह रास्ता बताया ही है। मेरे अनुभवका कोई जरूरतसे ज्यादा मतलब न निकाले । रामनाम सब जगह मौजूद रहनेवाली रामबाण दवा है, यह शायद मैने पहले-पहल उरुळीकाचनमे ही साफ-साफ जाना था । जो उसका पूरा उपयोग जानता है, उसे जगतमे कम-से-कम बाहरी काम करना पड़ता है। फिर भी उसका काम बड़े-से-बड़ा होता है। इस तरह विचार करते हुए मै कहता हू कि ब्रह्मचर्यकी रक्षाके जो नियम माने जाते है, वे तो खेल ही है । सच्ची और अमर रक्षा तो रामनाम ही है। राम जब जीभसे उतरकर हृदयमे बस जाता है, तभी उसका पूरा चमत्कार दिखलाई देता है। यह अचूक साधन पानेके लिए एकादश व्रत तो है ही । मगर कई साधन ऐसे होते है कि उनमे से कौनसा साधन