पृष्ठ:Ramanama.pdf/३४

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२१ रामनाम-रामबाण ईलाज यह देखकर कि कुदरती ईलाजोमे मैने रामनामको रोग मिटानेवाला माना है और इस सम्बन्धमे कुछ लिखा भी है, वैद्यराज श्री गणेशशास्त्री जोशी मुझसे कहते है कि इसके सम्बन्धका और इससे मिलता-जुलता साहित्य आयुर्वेदमे काफी पाया जाता है। रोगको मिटानेमे कुदरती इलाजका अपना बड़ा स्थान है और उसमे भी रामनाम विशेष है। यह मानना चाहिये कि जिन दिनो चरक, वाग्भट वगैराने लिखा था, उन दिनो ईश्वरको रामनामके रूपमे पहचाननेकी रूढ़ि पड़ी नही थी । उस समय विष्णुके नामकी महिमा थी । मैने तो बचपनसे रामनामके जरिये ही ईश्वरको भजा है। लेकिन मै जानता हू कि ईश्वरको ॐ नामसे भजो या सस्कृत, प्राकृतसे लेकर इस देशकी या दूसरे देशकी किसी भी भाषाके नामसे उसको जपो, परिणाम एक ही होता है। ईश्वरको नामकी जरूरत नही । वह और उसका कायदा दोनो एक ही है। इसलिए ईश्वरी नियमोका पालन ही ईश्वरका जप है। अतएव केवल तात्त्विक दृष्टिसे देखे, तो जो ईश्वरकी नीतिके साथ तदाकार हो गया है, उसे जपकी जरूरत नही । अथवा जिसके लिए जप या नामका उच्चारण सास-उसासकी तरह स्वाभाविक हो गया है, वह ईश्वरमय बन चुका है। यानी ईश्वरकी नीतिको वह सहज ही पहचान लेता है और सहज भावसे उसका पालन करता है । जो इस तरह बरतता है, उसके लिए दूसरी दवाकी जरूरत क्या ? ऐसा होने पर भी जो दवाओकी दवा है, यानी राजा दवा है, उसीको हम कम-से-कम पहचानते है। जो पहचानते है, वे उसे भजते नही; और जो भजते है, वे सिर्फ जबानसे भजते है, दिलसे नही । इस कारण वे तोतेके स्वभावकी नकल भर करते है, अपने स्वभावका अनुसरण नही । इसलिए वे सब ईश्वरको ‘ सर्वरोगहारी ' के रूपमे नही पहचानते । पहचाने भी कैसे ? यह दवा न तो वैद्य उन्हे देते हैं, न हकीम, और न डॉक्टर । खुद वैद्यो, हकीमो और डॉक्टरोको भी इस पर आस्था नही । यदि वे बीमारोको घर बैठे गगा-सी यह दवा दे, तो उनका धन्धा कैसे चले ? इसलिए उनकी दृष्टिमें तो उनकी पुडिया और शीशी ही रामबाण दवा है। इस दवासे उनका पेट भरता है और रोगीको हाथोहाथ फल २६